'एक परमात्मा के लिए, आइए हम एक हों', मैत्रेय दादाश्रीजी की रूस-यूक्रेन से शांति की अपील
वैश्विक शांति को बढ़ावा देने के मकसद से गठित इंटरनेशनल स्पिरिचुअल काउंसिल फॉर ट्रांसफॉर्मिंग ह्यूमैनिटी (ISCTH) के मंच से भारत के आध्यात्मिक गुरु मैत्रेय दादाश्रीजी ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर एक गंभीर संदेश जारी किया है।
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वैश्विक शांति को बढ़ावा देने के मकसद से गठित इंटरनेशनल स्पिरिचुअल काउंसिल फॉर ट्रांसफॉर्मिंग ह्यूमैनिटी (ISCTH) के मंच से भारत के आध्यात्मिक गुरु मैत्रेय दादाश्रीजी ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर एक गंभीर संदेश जारी किया है।
दुनिया भर में बढ़ते संघर्षों और युद्ध की आशंकाओं के बीच जारी इस पहल में दलाई लामा, वेटिकन के स्टेट सेक्रेटरी कार्डिनल पिएत्रो पारोलिन, UN-OCHA (UAE) और स्विस संसद से जुड़े कई प्रमुख नेताओं के संदेश भी शामिल किए गए हैं।
अपने संदेश में मैत्रेय दादाश्रीजी ने कहा कि विभाजनकारी, संकीर्ण सोच और स्वार्थ से प्रेरित प्रयास अपने अंतिम और निर्णायक चरण में और अधिक तीव्र होते जा रहे हैं। उन्होंने चेताया कि युद्ध के दुष्परिणाम केवल मानव सभ्यता तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि उस पृथ्वी को भी गहरी क्षति पहुंचाएँगे, जिसने अरबों वर्षों से जीवन का पालन-पोषण किया है। उनके अनुसार, यदि युद्ध नहीं रुका, तो मानवता की पीड़ा सदियों तक गूंजेगी और पृथ्वी ऐसी अपूरणीय क्षति झेलेगी।
मैत्रेय दादाश्रीजी ने मानवता की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए कहा कि हम इस पृथ्वी के स्वामी नहीं, बल्कि इसके संरक्षक हैं, इसलिए इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। उन्होंने यह भी बताया कि विश्व की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या यूरोप और एशिया में रहती है, इसलिए मानवता के भविष्य के प्रति इन दोनों महाद्वीपों की विशेष जिम्मेदारी बनती है।
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अपने संदेश के केंद्रीय बिंदु में उन्होंने रूस और यूक्रेन दोनों देशों से विनम्र अपील की कि वे संवाद और समाधान का मार्ग अपनाएं और स्थायी शांति स्थापित करें, ताकि दोनों देश मिलकर अपने क्षेत्र और पूरे विश्व के उज्ज्वल भविष्य के लिए कार्य कर सकें।
अपने संदेश का समापन उन्होंने भावनात्मक शब्दों के साथ किया - "एक परमात्मा के लिए, आइए हम एक हों। एक पृथ्वी के लिए, आइए हम एक हों।"
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गौरतलब है कि ISCTH की यह पहल ऐसे समय आई है जब रूस-यूक्रेन युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है और वैश्विक स्तर पर शांति प्रयासों को नई गति देने की कोशिशें तेज हो गई हैं। धार्मिक और आध्यात्मिक नेताओं का यह साझा मंच युद्धरत देशों पर नैतिक दबाव बनाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।