अपडेटेड 21 February 2026 at 14:41 IST

स्वाद, गंध और त्वचा के पिग्मेंटेशन में कमी: समग्र संतुलन से पुनर्स्थापन की दिशा

स्वामी रामदेव बताते हैं कि योग, प्राणायाम, संतुलित आहार और आयुर्वेदिक सिद्धांत शरीर की प्राकृतिक पुनरुद्धार क्षमता को सशक्त बनाने में सहायक हो सकते हैं।

Follow : Google News Icon  
direction of restoration from overall balance
समग्र संतुलन से पुनर्स्थापन की दिशा | Image: Republic

स्वाद और गंध की क्षमता में कमी या त्वचा के पिग्मेंटेशन से जुड़ी समस्याएं व्यक्ति के शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती हैं। कई बार ये समस्याएं संक्रमण, पोषण की कमी, तनाव या प्रतिरक्षा तंत्र की कमजोरी से जुड़ी होती हैं। इस संदर्भ में स्वामी रामदेव बताते हैं कि योग, प्राणायाम, संतुलित आहार और आयुर्वेदिक सिद्धांत शरीर की प्राकृतिक पुनरुद्धार क्षमता को सशक्त बनाने में सहायक हो सकते हैं। पतंजलि का दृष्टिकोण रोग के मूल कारणों को समझकर समग्र संतुलन स्थापित करने पर आधारित है।

पूरा वीडियो देखें:

मुख्य लेख

स्वाद और गंध की क्षमता हमारे तंत्रिका तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली से गहराई से जुड़ी होती है। जब शरीर संक्रमण, अत्यधिक तनाव या पोषण असंतुलन से गुजरता है, तो यह संवेदनात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। स्वामी रामदेव के अनुसार ऐसे मामलों में शरीर को भीतर से सशक्त बनाना आवश्यक है, ताकि वह स्वयं संतुलन की ओर लौट सके।

प्राणायाम इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अनुलोम-विलोम और भस्त्रिका जैसे अभ्यास श्वसन तंत्र को सक्रिय करते हैं और ऑक्सीजन की आपूर्ति बेहतर बनाते हैं। पर्याप्त ऑक्सीजन मस्तिष्क और तंत्रिकाओं के कार्य में सहायता करती है। नियमित अभ्यास से मानसिक स्पष्टता और ऊर्जा में वृद्धि अनुभव की जा सकती है।

आहार सुधार भी उतना ही आवश्यक है। सात्विक और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन- जैसे ताजे फल, हरी पत्तेदार सब्जियां, साबुत अनाज और पर्याप्त जल- शरीर की कोशिकाओं के पुनर्निर्माण में सहायक होते हैं। स्वामी रामदेव बताते हैं कि अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, कृत्रिम रंग और परिष्कृत शर्करा से बचना चाहिए, क्योंकि ये शरीर में सूजन और असंतुलन बढ़ा सकते हैं।

Advertisement

त्वचा के पिग्मेंटेशन की समस्या के संदर्भ में आयुर्वेद त्वचा को शरीर की आंतरिक स्थिति का दर्पण मानता है। यदि पाचन तंत्र कमजोर है या शरीर में विषाक्तता बढ़ी हुई है, तो उसका प्रभाव त्वचा पर दिखाई दे सकता है। योगासन जैसे सर्वांगासन, भुजंगासन और मण्डूकासन पेट और रक्त संचार को सक्रिय करने में सहायक माने जाते हैं। हालांकि, किसी भी अभ्यास को अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार और प्रशिक्षित मार्गदर्शन में करना चाहिए।

तनाव प्रबंधन को भी इस चर्चा में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। निरंतर मानसिक दबाव प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकता है। ध्यान और श्वास अभ्यास मानसिक शांति प्रदान करते हैं, जिससे शरीर की पुनरुद्धार क्षमता बेहतर हो सकती है। पतंजलि का समग्र दृष्टिकोण शरीर, मन और भावनाओं के संतुलन को समान महत्व देता है।

Advertisement

स्वामी रामदेव स्पष्ट करते हैं कि यदि स्वाद, गंध या त्वचा से जुड़ी समस्याएं लंबे समय तक बनी रहें, तो चिकित्सकीय जांच आवश्यक है। योग और आयुर्वेद सहायक उपाय हो सकते हैं, परंतु वे चिकित्सकीय परामर्श का विकल्प नहीं हैं। समन्वित दृष्टिकोण अपनाना ही विवेकपूर्ण मार्ग है।

इस प्रकार, संवेदनात्मक और त्वचा संबंधी समस्याओं का समाधान केवल बाहरी उपचार से नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन से जुड़ा है। नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और सकारात्मक मानसिकता इस प्रक्रिया को समर्थन देते हैं।

निष्कर्ष

स्वाद, गंध और पिग्मेंटेशन की समस्याएं शरीर के भीतर के असंतुलन का संकेत हो सकती हैं। स्वामी रामदेव के मार्गदर्शन में पतंजलि का समग्र मॉडल संतुलित जीवनशैली, योग और जागरूकता पर बल देता है। धैर्य, अनुशासन और चिकित्सकीय मार्गदर्शन के साथ समन्वित प्रयास से स्वास्थ्य में क्रमिक सुधार संभव है।

Published By : Priyanka Yadav

पब्लिश्ड 21 February 2026 at 14:41 IST