उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन: योगी का मंदिर मॉडल और आस्था का अर्थशास्त्र

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह सोच है कि श्रद्धा कोई आर्थिक बोझ नहीं बल्कि एक पूंजी है और उसे पहचान कर संवारा जाए तो वह रोजगार, निवेश और आत्मविश्वास का स्रोत बन सकती है। यह सोच आर्थिक दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही वैचारिक भी।

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अयोध्या में राम मंदिर
अयोध्या में राम मंदिर | Image: ANI

प्रो. अनूप मिश्रा

आम तौर पर मनुष्य को हिसाब लगाने वाला प्राणी माना जाता रहा है, जो लाभ और हानि के तराजू पर अपना हर निर्णय तौलता है। परन्तु, भारतीय समाज ने सदियों से इस धारणा को चुपचाप झुठलाया है। यहां मंदिर के आंगन में बाजार पनपे, मेलों-तीर्थों की छाया में व्यापार परवान चढ़ा और नदियों के किनारे धर्म के साथ अर्थव्यवस्था भी फली-फूली। काशी का घाट, मथुरा की कुंज गली और अयोध्या का सरयू तट केवल पूजा स्थल नहीं थे, वे अपने समय के आर्थिक केंद्र भी थे। उत्तर प्रदेश आज उसी भूली हुई परंपरा को नई भाषा में दोहरा रहा है। इसके पीछे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह सोच है कि श्रद्धा कोई आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि एक पूंजी है और उसे पहचान कर संवारा जाए तो वह रोजगार, निवेश और आत्मविश्वास का स्रोत बन सकती है। यह सोच आर्थिक दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही वैचारिक भी और इसे उसी गहराई से परखा जाना चाहिए।

पहले तथ्य। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2021 से अब तक यूपी में 950 से अधिक मंदिरों और तीर्थस्थलों का जीर्णोद्धार, विस्तार या पुनर्निर्माण हुआ है। 650 से ज्यादा परियोजनाएं 2025 तक पूरी हो चुकी हैं और करीब 300 अग्रिम चरण में हैं। उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा क्षेत्रों में शायद ही कोई ऐसा हो जहां एक से लेकर पांच धार्मिक स्थलों पर काम न हुआ हो। घरेलू पर्यटकों की संख्या 2017 में 23 करोड़ थी, जो 2025 के अंत तक 156 करोड़ हो गई है तो यह अनायास नहीं है। ‘यह अर्थव्यवस्था का कब्रिस्तान से मंदिर की ओर स्थानांतरण है।’मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इन शब्दों में राजनीतिक धार अवश्य है, पर उसके पीछे एक गंभीर प्रस्थापना भी है कि विकास का रास्ता समाज की अपनी सांस्कृतिक स्मृति से होकर भी निकल सकता है।

अब प्रश्न यह कि धार्मिक पर्यटन की इस अवधारणा का वैचारिक केंद्र क्या है? विकास का आयातित मॉडल प्रायः यह मानकर चलता है कि आधुनिकता का अर्थ परंपरा से दूरी है। कारखाने और कॉरिडोर, शहर और तीर्थ, अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं। उत्तर प्रदेश का प्रयोग इस द्वैत को नकारता है। वह कहता है कि जिस समाज की सबसे गहरी पूंजी उसकी आस्था है, वहां विकास की योजना उस पूंजी को छोड़कर नहीं बन सकती। इस दृष्टि से गांव का मंदिर सामूहिक स्मृति का वह केंद्र है जहां लोग मिलते हैं, त्योहार मनाते हैं और अपनी साझा पहचान महसूस करते हैं। ग्रामीण और अर्ध-शहरी उत्तर प्रदेश में मंदिर सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र हैं और उन्हें मजबूत करने से लोगों से जुड़ाव गहरा होता है। अर्थशास्त्री इसे सामाजिक पूंजी कहते हैं।

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इस दर्शन को मूर्त रूप देने वाली संरचना को देखें। गांव के मंदिर में चालीस लाख से डेढ़ करोड़ रुपये के खर्च से बनी चहारदीवारी, पेयजल, शौचालय और सोलर लाइट का मतलब है कि सार्वजनिक सुविधा श्रद्धा के बहाने गांव की दहलीज तक पहुंची। इस संरचना के आधार में जिला स्तरीय धर्मशालाओं, कुंडों व पार्किंग स्थलों का निर्माण या पुनरुद्धार है तो इसके शीर्ष पर काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या और विंध्यवासिनी कॉरिडोर आदि स्थानों पर हजारों-लाखों करोड़ का निवेश है। इसमें आस्था केवल भावना नहीं, बल्कि निर्माण, परिवहन, आतिथ्य और हस्तशिल्प की पूरी मूल्य-श्रृंखला का आधार बन जाती है। नाविक, फूल बेचने वाला, गाइड, प्रसाद बनाने वाला कारीगर, ये सब उस अर्थव्यवस्था के भागीदार हैं जो श्रद्धा की गति से चलती है।

यहां अयोध्या का उदाहरण रखा जा सकता है, जहां राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल दर्ज किया गया। आईआईएम लखनऊ की विस्तृत केस स्टडी के अनुसार अयोध्या में पर्यटन, निवेश, रोजगार और राजस्व में व्यापक वृद्धि देखी गई। प्रतिदिन औसतन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन से आतिथ्य उद्योग को नई गति मिली, 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे स्थापित हुए तथा ऑनलाइन ट्रैवल बुकिंग चार गुना तक बढ़ी। हस्तशिल्प, स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की मांग से कारीगरों को सीधा लाभ मिला। लगभग 6,000 एमएसएमई खुले और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 2,500 रुपये तक पहुंची। पर्यटन से कर राजस्व 20,000-25,000  करोड़ तक पहुंचने और अगले 4-5 वर्षों में लगभग 1.2 लाख रोजगार सृजित होने का अनुमान है।

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अब आस्था से जुड़ी अर्थव्यवस्था का एक और पहलू देखें। 156करोड़ पर्यटकों की संख्या में बार-बार आने वाले और एक दिवसीय यात्री भी शामिल हैं, इसलिए असली प्रश्न प्रति यात्री खर्च, ठहराव की अवधि और स्थानीय आय का है। पर्यटन के रोजगार प्रायः मौसमी और अनौपचारिक होते हैं। आस्था की अर्थव्यवस्था तभी टिकाऊ होती है, जब वह सम्मानजनक आय और कौशल भी दे, और योगी सरकार में यही संभव हुआ। आस्था के साथ ही उद्योग, कृषि-प्रसंस्करण और सेवा क्षेत्र को भी उतना ही बल मिल रहा है। उत्तर प्रदेश का वन ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य साधने के लिए इस तरह की बहुआयामी सोच जरूरी है। आगे का मार्ग इस वैचारिक संतुलन को बनाए रखने में है। मंदिरों को अलग-थलग परियोजनाओं की जगह तीर्थ-परिपथों में पिरोया जाए, ताकि श्रद्धालु एक की जगह कई दिन ठहरे। होमस्टे, स्थानीय हस्तशिल्प और क्षेत्रीय व्यंजनों को और बढ़ावा मिले ताकि रोजगार और अधिक स्थानीय हाथों तक पहुंचे। यूपी सरकार इस दिशा में काम कर रही है।

धार्मिक पर्यटन में आस्था और अर्थशास्त्र का संयोग तो है ही, इसे व्यापक जन-समर्थन भी हासिल है। पूर्वांचल में काशी और विंध्याचल, अवध में अयोध्या और नैमिषारण्य, पश्चिम मेंशाकंभरी देवी और औघड़नाथ, बुंदेलखंड में कालिंजर और चित्रकूट, ब्रज में मथुरा और गोवर्धन परिक्रमा। इन तमाम स्थानों पर विकसित की गई आधुनिक सुविधाओं ने आमजन में सरकार की सकारात्मक छवि सुदृढ़ की है। हर विधायक को एक से तीन मंदिरों के उन्नयन का सुझाव देने का अधिकार इस जुड़ाव को संस्थागत बनाता है। शायद यही वजह है कि सर्वेक्षण सरकार के पक्ष में दिखते हैं। अप्रैल 2026 में दैनिक भास्कर के सर्वेक्षण ने 403 में से 256 सीटों पर भाजपा को आगे बताया, जबकि सितंबर में न्यूज लीडर और मैट्रिज के सर्वेक्षण ने भाजपा गठबंधन को 267 सीटें दीं। सर्वेक्षण जनादेश नहीं होते, पर वे बताते हैं कि हिंदुत्व और विकास की मिली-जुली छवि मतदाता के मन में कायम है।

धार्मिक पर्यटन का यह प्रयोग एक पुराने प्रश्न का नया उत्तर खोज रहा है कि विकास का अर्थ क्या है। यदि उसका अर्थ केवल उत्पादन और उपभोग है, तो मंदिर एक पर्यटन-उत्पाद भर हैं। पर यदि विकास का अर्थ समाज को उसकी जड़ों से जोड़े रखते हुए आगे बढ़ाना है, तो आस्था स्वयं एक पूंजी है। ऐसी पूंजी जो खर्च होने पर घटती नहीं, बल्कि सही ढंग से संभाली जाए तो बढ़ती है। उत्तर प्रदेश ने इसी विश्वास पर दांव लगाया है। 2022  के जनादेश ने यह बताया है कि जनता ने यह दांव स्वीकार किया है।

(लेखक- प्रो. अनूप मिश्रा, अर्थशास्त्री, डीएवी पीजी कॉलेज, वाराणसी)

Disclaimer: इस आर्टिकल में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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 Initiative Desk
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