कौन थे राजा रवि वर्मा, जिनकी 'यशोदा और कृष्ण' पेंटिंग को सायरस पूनावाला ने 167.2 करोड़ में खरीदा?
राजा रवि वर्मा की प्रसिद्ध पेंटिंग 'यशोदा और कृष्ण' मुंबई की सैफ्रनआर्ट नीलामी में 167.2 करोड़ रुपये में बिकी। यह अब तक की सबसे महंगी भारतीय पेंटिंग बन गई। पेंटिंग को सीरम इंस्टीट्यूट के मालिक डॉ. सायरस पूनावाला ने खरीदा। इससे पहले का रिकॉर्ड एम.एफ. हुसैन की पेंटिंग का था।
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Raja Ravi Varma Painting : भारतीय कला की दुनिया में एक बड़ा रिकॉर्ड बन गया है। प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा की 1890 के दशक की पेंटिंग 'यशोदा और कृष्ण' को नीलामी में ₹167.2 करोड़ में बेचा गया। यह अब तक की सबसे महंगी भारतीय पेंटिंग बन गई है।
यह नीलामी मुंबई की कंपनी सैफरन आर्ट (Saffronart) की स्प्रिंग लाइव नीलामी में 1 अप्रैल 2026 को हुई। पेंटिंग की अनुमानित कीमत 80 से 120 करोड़ थी, लेकिन बोली इतनी तेजी से बढ़ी कि यह उससे भी ज्यादा पर बिक गई। बोली लगभग सात मिनट तक चली।
क्यों खास है पेंटिंग?
पेंटिंग में भगवान कृष्ण के बचपन को उनकी पालक मां यशोदा के साथ दिखाया गया है। यह मां के प्यार की खूबसूरत तस्वीर है। राजा रवि वर्मा ने इसे अपने करियर के चरम पर बनाया था। इसमें यूरोपीय चित्रकला की तकनीक को भारतीय विषय के साथ मिलाया गया है। पेंटिंग में यशोदा गाय का दुध निकाल रही हैं और छोटे कृष्ण उनके पास एक सुनहरे प्याले के साथ खड़े हैं। यह भारतीय संस्कृति और भक्ति भावना से जुड़ी एक बहुत लोकप्रिय थीम है।
किसने खरीदी 167.2 करोड़ की पेंटिंग?
इस पेंटिंग को भारत के उद्योगपति और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के मालिक डॉ. सायरस एस. पूनावाला ने खरीदा है। उन्होंने कहा कि यह राष्ट्रीय खजाना है। उन्होंने इसे खरीदना अपनी खुशकिस्मती बताया और कहा कि वे समय-समय पर इसे आम लोगों के लिए प्रदर्शनी में दिखाने का इंतजाम करेंगे।
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पुराना रिकॉर्ड टूटा
इससे पहले का रिकॉर्ड मकबूल फिदा हुसैन (M. F. Husain) की पेंटिंग 'Untitled (Gram Yatra)' का था, जो पिछले साल 118 करोड़ रुपये में बिकी थी। राजा रवि वर्मा की यह पेंटिंग न सिर्फ हुसैन के रिकॉर्ड को तोड़ गई, बल्कि किसी भी भारतीय कलाकार की नीलामी में बिकी सबसे महंगी कृति भी बन गई। सैफ्रनआर्ट ने बताया कि उनकी पूरी नीलामी बहुत सफल रही और सभी लॉट्स बिक गए।
राजा रवि वर्मा कौन थे?
राजा रवि वर्मा (1848-1906) को आधुनिक भारतीय चित्रकला का जनक माना जाता है। वे त्रावणकोर (Travancore) रियासत के राज परिवार से थे। उन्होंने यूरोपीय तेल चित्रकला की शैली को भारतीय देवी-देवताओं और महाकाव्यों के विषयों के साथ जोड़ा। उनकी पेंटिंग्स इतनी लोकप्रिय हुईं कि उन्होंने 1894 में एक लिथोग्राफ प्रेस भी शुरू की, जिससे सस्ते प्रिंट्स आम लोगों तक पहुंचे। आज भी करोड़ों भारतीय देवी-देवताओं की तस्वीर उनके स्टाइल में ही देखते हैं।
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यह बिक्री भारतीय कला बाजार के बढ़ते महत्व को दिखाती है। कलेक्टर अब भारतीय कलाकृतियों पर पहले से ज्यादा कीमत देने को तैयार हैं। यह भारतीय संस्कृति की कीमत और उसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। यह पेंटिंग अब न सिर्फ कला प्रेमियों के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय बन गई है।