Saharanpur Mosque: सहारनपुर मस्जिद मामले में ASI की एंट्री, 20 फीट गहरे कुएं की जांच के लिए पहुंची टीम
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में अवैध घोषित मस्जिद के ध्वस्तीकरण के दौरान जमीन के नीचे लगभग 20-22 फीट गहरा और 1.5 मीटर व्यास का एक पुराना कुआं मिला है। यह कुआं एक भारी स्लैब से ढका हुआ था और इसमें पुरानी लखौरी ईंटों का प्रयोग देखा गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, लखौरी ईंटों का उपयोग मुख्य रूप से 17वीं से 18वीं शताब्दी मुगलकाल के दौरान होता था।
- भारत
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सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में अनधिकृत निर्माण मस्जिद को हटाए जाने के बाद मामले ने एक नया और दिलचस्प मोड़ ले लिया है। मलबे की सफाई के दौरान मस्जिद के ठीक बीचों-बीच लगभग 20 से 22 फीट गहरा और डेढ़ मीटर चौड़ा एक प्राचीन कुआं दिखाई दिया।
इस कुएं के सामने आने के बाद प्रशासन से लेकर आम जनता के बीच हलचल तेज हो गई है। कुएं की अनोखी बनावट और इसमें इस्तेमाल हुई पुरानी ईंटों को देखते हुए ASI को इसकी गहन जांच के लिए शामिल किया गया है।
ध्वस्तीकरण के बाद सामने आया रहस्यमयी ढांचा
कलेक्ट्रेट परिसर स्थित इस मस्जिद को प्रशासन द्वारा अदालती आदेशों और अपील खारिज होने के बाद नियमानुसार हटाया गया था। जब पोकलेन मशीनों से मलबा हटाने का काम शुरू हुआ, तब जमीन के नीचे छिपा यह ढांचा सामने आया। बताया जा रहा है कि कुएं को एक बेहद भारी-भरकम स्लैब से ढका गया था, जिसे तोड़ना मशीनों के लिए भी बेहद चुनौतीपूर्ण रहा।
कुएं की गहराई लगभग 20 फीट से अधिक है और इसमें इस्तेमाल की गई ईंटें आधुनिक न होकर पुरानी 'लखौरी ईंटें' बताई जा रही है। इस नई खोज ने पूरी घटना में एक ऐतिहासिक कोण जोड़ दिया है।
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लखौरी ईंटें और ASI की वैज्ञानिक जांच
उत्तर भारत में मुगलकाल के दौरान विशेषकर 17वीं और 18वीं शताब्दी में लखौरी ईंटों का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जाता था। इन ईंटों की चुनाई में गारे और चूने का इस्तेमाल होता था और यह परंपरा लगभग 1850 तक जारी रही। हालांकि, केवल ईंटों के आधार पर किसी ढांचे की सटीक उम्र तय नहीं की जा सकती। इसी वजह से प्रशासन ने एएसआई की टीम से संपर्क किया है, ताकि वैज्ञानिक पद्धति से कुएं की वास्तविक साल और इसके निर्माण काल का सही आकलन किया जा सके।
देवस्थान से जुड़ा होने का दावा
विपक्ष ने मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने इसे 'ब्लैक डे' करार दिया है, वहीं समाजवादी पार्टी सहित अन्य नेताओं ने आरोप लगाया है कि प्रक्रिया का सही से पालन नहीं किया गया। इसके अलावा कुछ स्थानीय लोगों द्वारा इसे किसी प्राचीन देवस्थान से जुड़ा ढांचा होने का दावा भी किया जा रहा है, जिसकी पुष्टि होना अभी बाकी है। आपको बता दें, स्थिति को नियंत्रण में रखने और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। अब सभी की नजरें एएसआई के सर्वे और राजस्व विभाग की रिपोर्ट पर टिकी हैं।
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पुरातत्व विभाग के डॉ. मनोज कुमार यादव का कहना है कि हम यह समझने के लिए इसे इतिहास के साथ सहसंबंधित करने का भी लक्ष्य रखते हैं कि यह किससे संबंधित है। निरीक्षण के दौरान - हालांकि संरचना एक कुएं जैसा दिखता है - हमने देखा कि यह मलबे से भरा हुआ है जो अंदर गिर गया है। यह सतह के स्तर से 20 फीट ऊंचा है और इसका व्यास तीन फीट है। इसका निर्माण लखोरी ईंटों का उपयोग करके किया गया है। उपयोग किया जाने वाला बाध्यकारी मोर्टार एक चूना-सुरखी मिश्रण है, और शीर्ष सतह से तीन फीट की गहराई पर, चूने के प्लास्टर की एक पतली परत होती है। इस तरह की संरचनाएं, जो बाद के मध्ययुगीन चरण की विशेषता हैं, आमतौर पर भारत के ऊपरी और मध्य गंगा घाटी क्षेत्रों में पाई जाती हैं।