नाथपंथ की साधना से जुड़े चिह्नों को इकट्ठा कर डिजिटल रूप देने की जरूरत : योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आज नाथपंथ की साधना पद्धति से जुड़े चिह्नों, अवशेषों को इकट्ठा कर डिजिटल रूप से संजोने की जरूरत है।

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Yogi Adityanath
Yogi Adityanath | Image: PTI

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को कहा कि आज नाथपंथ की साधना पद्धति से जुड़े चिह्नों, अवशेषों को इकट्ठा कर डिजिटल रूप से संजोने की जरूरत है। योगी मंगलवार दोपहर बाद दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में आयोजित योगिराज बाबा गंभीरनाथ पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा ने भौतिकता का अतिक्रमण कर ब्रह्मांड के रहस्यों को खोजा है तथा नाथपंथ की सिद्ध साधना पद्धति ने भी लोक कल्याण केंद्रित इसी आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर में तिब्बत से लेकर सुदूर दक्षिण में श्रीलंका तक तथा पूर्व में इंडोनेशिया और बांग्लादेश से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक भारतीय साधना पद्धति के चिह्न देखने को मिलते हैं। एक आधिकारिक बयान के मुताबिक मुख्यमंत्री ने कहा, “नाथपंथ के चिह्नों और अवशेषों को एकत्र कर संजोने में गोरखपुर विश्वविद्यालय की महायोगी गुरु गोरखनाथ शोध पीठ और योगिराज बाबा गंभीरनाथ शोध पीठ बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि विरासत पर गौरव की अनुभूति करने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपनी साधना पद्धतियों से वर्तमान और भावी पीढ़ी को परिचित करा सकें। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते इस विरासत को नहीं संजोया गया तो साधना पद्धतियों के लिए भी योग के पेटेंट जैसा संघर्ष करना पड़ सकता है।

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गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर योगी ने कहा कि देश- दुनिया में भारतीय ज्ञान परंपरा के तीन आयामों बौद्ध, आदि शंकराचार्य और महायोगी गोरखनाथ की साधना से जुड़े चिह्न यत्र-तत्र मिलते हैं तथा इनमें भी नाथपंथ की परंपरा किसी न किसी नाथयोगी और सिद्धों के माध्यम से विद्यमान रही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि नाथपंथ की परंपरा भगवान शिव से आगे बढ़ती है तथा योगी मत्स्येंद्रनाथ से आगे महायोगी गोरखनाथ ने इसे व्यवस्थित रूप दिया।

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योगी आदित्यनाथ का कहना था कि ऐसी मान्यता है कि महायोगी गोरखनाथ, शिव जी के ही योगी रूप हैं।

नाथ परंपरा की विस्तार से जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि योगिराज बाबा गंभीरनाथ जी महाराज ऐसे ही चमत्कारिक सिद्ध योगी थे जिनका 1870 के दशक में गोरखपुर आगमन हुआ था।

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि बाबा गंभीरनाथ ने गोरखनाथ मंदिर के तत्कालीन महंत गोपालनाथ जी से दीक्षा ली, उसके बाद साधना और सेवा कार्य में रत हो गए तथा उन्होंने काशी, प्रयाग, नर्मदा तट, गया आदि स्थलों पर साधना कर चरम सिद्धि प्राप्त की।

मुख्यमंत्री ने दावा किया कि उन्होंने इस सिद्धि का जब भी उपयोग किया तो लोक कल्याण केंद्रित ही रहा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी को मंदिर के उद्धार करने की जिम्मेदारी योगिराज बाबा गंभीरनाथ ने ही दिलाई थी। उनकी शिष्य परंपरा देश के कई राज्यों में है।

योगी आदित्यनाथ के अनुसार योगिराज बाबा गंभीरनाथ के समाधिस्थ होने के 108 साल बाद भी जब भी गोरखनाथ मंदिर में कोई आयोजन होता है तो बंगाल, गया, रांची, धनबाद आदि जगहों से उनकी शिष्य परंपरा के लोग यहां आकर कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

विशिष्ट अतिथि नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय नालंदा के आचार्य प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने कहा कि बाबा गंभीरनाथ ने अनुभव और वैचारिकी से मानवीय गरिमा को स्थापित किया तथा उनके कार्य सभ्यता के आख्यान हैं।

स्वागत संबोधन दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो पूनम टंडन ने किया जबकि आयोजन के उद्देश्यों की जानकारी राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक, योगिराज बाबा गंभीरनाथ शोध पीठ के प्रो द्वारिका नाथ ने दी।

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Published By:
 Deepak Gupta
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