पांच साल काम करने के बाद यूएस की कंपनी को छोड़ बेजुबानों की आवाज बनी तृप्ति; अब स्ट्रीट डॉग्स ही उनका परिवार
छोटे से घर में रहने वाली इंजीनियर तृप्ति ने जयपुर व उदयपुर में रहते हुए यूएस की एक कंपनी में पांच साल तक कार्य भी किया, लेकिन कोरोना काल में जब वे घर आईं तो यहां गली-मोहल्लों में बेजुबानों की पीड़ा ने उनका मन दृवित कर दिया।
- भारत
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विशाल खंडेलवाल
जिन्हें हम दुत्कारते हैं उसकी सेवा करना और पारिवारिक सदस्य के रूप में घर पर रखने में ही उसे तृप्ति मिलती है। सेवा के जिस सफर पर वे निकली है उसमें अपना करियर व रोजगार तक पीछे छोड़ चुकी हैं। बेजुबानों से किया वादा वे अपने सेवा के सफर में साथ लेकर चल रही है। आजीवन शादी नहीं करने की मानस बना चुकी तृप्ति के लिए अब ये डॉग्स ही उनका परिवार है।
जी हां, हम बात कर रहे हैं सिरोही निवासी तृप्ति जैन की है। यहां छोटे से घर में रहने वाली इंजीनियर तृप्ति ने जयपुर व उदयपुर में रहते हुए यूएस की एक कंपनी में पांच साल तक कार्य भी किया, लेकिन कोरोना काल में जब वे घर आईं तो यहां गली-मोहल्लों में बेजुबानों की पीड़ा ने उनका मन दृवित कर दिया। बस यही से उनका मन बदल गया और वे अपने रोजगार, करियर और यहां तक कि भविष्य बनाने के सपनों को पीछे छोड़ दिया।
अब वे अपने सुनहरे भविष्य या भावी जीवन को नहीं बल्कि बेजुबानों का जीवन बचाने में जुटी हुई हैं। स्ट्रीट डॉग्स की सेवा और उनका जीवन बचाने की इस मुहिम में उनके माता-पिता भी उनका पूरा साथ दे रहे हैं। घायल और बीमार स्ट्रीट डॉग्स की तिमारदारी के लिए वे एक बड़ा शेल्टर हाउस बनाना चाह रही है। फिलवक्त वे अपने घर में ही डॉग्स की सेवा कर रही हैं। अभी उनके पास 28 अपंग व बीमार डॉग्स है।
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इसलिए जरूरी है शेल्टर हाउस
अलसुबह से ही डॉग्स के लिए खाना बनाने से लेकर उपचार तक की व्यवस्था की जा रही है। यह सब काम अभी वे घर पर रहते हुए ही कर रही हैं। यह जगह इतनी कम पड़ रही है कि बड़ी मुश्किल हो रही है। वे चाहती हैं कि डॉग्स के लिए एक बड़ी जगह में शेल्टर हाउस व चिकित्सालय खोलना चाह रही हैं। उनका कहना हैं कि कई ऐसे डॉग्स भी हैं, जिनका उपचार लम्बा चलता है या फिर ऐसे अपंग भी है, जो गलियों में वापस नहीं छोड़ सकते। उनके लिए शेल्टर हाउस आवश्यक है।
डॉग्स की पसंद-नापसंद का पूरा ख्यालस्ट्रीट डॉग्स की सेवा में उन्हें परिवार का भी पूरा साथ मिल रहा है। उनकी माता सुबह तीन बजे से काम पर लग जाती है। डॉग्स के लिए तो खाना बनता ही है, घर के बाहर आने वाले अन्य घुमंतू पशुओं के लिए नियमित खाना पकता है। इसके बाद घर के ऊपरी कमरे में बने डॉग्स के शेल्टर हाउस की साफ-सफाई करतीं है। खाने में डॉग्स की पसंद-नापसंद का भी पूरा ख्याल रखते हुए वे कार्य करती हैं।
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जानवरों को भी जीने का पूरा हक है
उनकी माता गीतादेवी व पिता दिनेशकुमार जैन बताते हैं कि उनकी बेटी भगवान महावीर के जियो और जीने दो सिद्धांत पर काम कर रही है। यह भगवान महावीर के अहिंसा परमो धर्म की प्रेरणा ही है कि जिन जानवरों को इस धरती पर भगवान ने भेजा है उनको जीने का पूरा हक मिले इसके लिए उनकी बेटी तृप्ति काम कर रही है। इस काम में पूरा परिवार उसके साथ हैं। बेटी के इस सेवा कार्य से वे बेहद खुश है। उसके किसी भी निर्णय में उनकी पूरी सहमति है, फिर चाहे वह शादी का निर्णय हो या उसके करियर का।
कॉल आने पर वे निकल पड़ती है
स्ट्रीट डॉग्स लवर तृप्ति बताती है कि आसपास के एरिया से कॉल आने पर वे विजिट भी करती हैं। चिकित्सों से उपचार करवाने के बाद उनकी देखभाल का पूरा जिम्मा लेती हैं। इलाज के बाद कुछ डॉग्स ठीक होकर वापस गली-मोहल्लों में चले जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जो अपंग या गंभीर रूप से बीमार होते हैं एवं सर्वाइव नहीं कर पाते उनको घर पर ही रखना होता है। इसके लिए घर के ऊपरी कमरे में शेल्टर हाउस बनाया है, लेकिन काम के लिहाज से जगह कम पड़ रही है।
इसलिए शादी नहीं करने का फैसला लिया
उनका कहना है कि गली-मोहल्लों में घूमते हुए लोग रूट्रीट डॉग्स को दुत्कारते हैं कोई लकड़ी से भी मारता है। डॉग्स की पीड़ा को देखकर वे बेहद दुखी है। अब तो वे अपना पूरा जीवन उनकी सेवा में समर्पित कर चुकी है। इसमें कोई अड़चन न आए इसके लिए वे शादी नहीं करने का भी फैसला कर चुकी है। माता-पिता को भी वे अपने निर्णय बना चुकी है और वे उनके निर्णय से सहमत है।