'भारत में रहोगे तो संविधान मानना होगा', मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को UCC पर चक्रपाणि ने दिया जवाब

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि मुसलमानों को एक समान या धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता स्वीकार्य नहीं है। इस पर हिंदू संगठनों ने आपत्ति जताई है।

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Swami Chakrapani Maharaj, VHP vinod bansal replied to Muslim Personal Law Board
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को हिंदू संगठनों ने जवाब दिया। | Image: ANI/PTI

समान नागरिक संहिता (UCC) पर देश में फिर बहस छिड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके से लाल किले की प्राचीर से UCC का जिक्र किया था। इसको लेकर अब बयानबाजी तेज हो चुकी है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को UCC मंजूर नहीं है और इसके गंभीर परिणाम तक की चेतावनी दी जा रही है। हालांकि हिंदू संगठन यूसीसी को संविधान से जोड़ रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को देश में सेक्युलर सिविल कोड की जोरदार वकालत की थी। मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में समान नागरिक संहिता और इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का जिक्र किया था। उन्होंने देश में गंभीर चर्चा की जरूरत पर बल दिया। अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था, 'देश का एक बहुत बड़ा वर्ग मानता है कि जिस नागरिक संहिता को लेकर हम लोग जी रहे हैं, वो सचमुच में सांप्रदायिक और भेदभाव करने वाली संहिता है। मैं चाहता हूं कि इस पर देश में गंभीर चर्चा हो और हर कोई अपने विचार लेकर आए। जो कानून धर्म के आधार पर देश को बांटते हैं और ऊंच-नीच का कारण बन जाते हैं, उन कानूनों का आधुनिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता। अब देश की मांग है कि देश में धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता हो।'

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का पक्ष

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि मुसलमानों को एक समान या धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि वो शरिया कानून (मुस्लिम पर्सनल लॉ) से कभी समझौता नहीं करेंगे। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, 'हम स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री के धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता के लिए आह्वान और धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों को सांप्रदायिक करार दिए जाने को अत्यधिक आपत्तिजनक मानते हैं।'

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि भारत के मुसलमानों ने कई बार ये स्पष्ट किया है कि उनके पारिवारिक कानून शरीयत पर आधारित हैं, जिससे कोई भी मुसलमान किसी भी कीमत पर विचलित नहीं हो सकता है और कहा कि देश की विधानमंडल ने स्वयं शरीयत एप्लीकेशन एक्ट 1937 को मंजूरी दी है और भारत के संविधान ने अनुच्छेद 25 के तहत धर्म को मानने, उसका प्रचार करने और उसका पालन करने को मौलिक अधिकार घोषित किया है। बोर्ड ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ये मुसलमानों को अस्वीकार्य है, क्योंकि वो शरिया कानून (मुस्लिम पर्सनल लॉ) से कभी समझौता नहीं करेंगे। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने इसे एक सोची-समझी साजिश बताया और कहा कि इसके गंभीर परिणाम होंगे।

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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले के बाद हिंदू संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। अखिल भारत हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि महाराज कहते हैं, 'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से समान नागरिक संहिता लाने के प्रयास को अस्वीकार करना अति निंदनीय है।' उन्होंने कहा कि भारत में रहना होगा तो संविधान को मानना होगा, सबको बराबर के अधिकार वाले समान नागरिक संहिता को मनाना होगा, अन्यथा शरिया कानून मानने वाले मुस्लिम देशों में चले जाएं, उनके लिए 56 देश हैं।'

वीएचपी के प्रवक्ता विनोद बंसल कहते हैं, 'जब से लाल किले की प्राचीन से यूसीसी की बात हुई है, तब से कुछ लोगों को नींद नहीं आ रही है। संविधान विरोधी मानसिकता के लोग परेशान हैं। संविधान के सबको सम्मान अधिकार की बात करता है।'

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Published By:
 Dalchand Kumar
पब्लिश्ड