महिला आरक्षण पर साथ, लेकिन परिसीमन का विरोध क्यों कर रहा विपक्ष? संसद में टकराव के आसार; क्या है सरकार का तर्क?

Modi Government vs Opposition: विवाद की जड़ परिसीमन है। विपक्ष का तर्क है कि अगर सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या वृद्धि के आधार पर हुआ, तो दक्षिण भारतीय राज्यों को "बेहतर प्रदर्शन की सजा" मिलेगी।

Follow : Google News Icon  
Parliament Special Session
परिसीमन पर विवाद क्यों? | Image: Republic

Parliament Special Session: संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र में पेश किए जाने वाले अहम बिलों को लेकर सियासत गरमा गई है। विपक्ष ने साफ कर दिया है कि वो महिला आरक्षण को लेकर तो सरकार के साथ है, लेकिन परिसीमन का एकजुट होकर विरोध करने वाला है। ऐसे में संसद में बिल पेश होते ही जोरदार हंगामे के आसार हैं। सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसी क्या वजह है, जो विपक्ष परिसीमन के खिलाफ है? आइए जानते हैं...

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने तीन अहम बिलों का संसद में पास कराने के लिए ये तीन दिवसीय सत्र बुलाया है। इसमें केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक 2026, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 (डीलिमिटेशन बिल 2026) शामिल हैं। इन बिलों पर चर्चा के लिए लोकसभा में 18 घंटे और राज्यसभा में 10 घंटे का समय निर्धारित किया गया है।

परिसीमन को लेकर हो रहा विवाद

सरकार का मकसद 2029 के चुनावों से पहले ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का है। साथ ही साथ सरकार लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना चाहती है, जिसमें से 815 सीटें राज्यों के लिए और बाकी 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी। इसमें से एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना है।

परिसीमन क्या है और क्यों हो रहा है?

विवाद की जड़ परिसीमन ही है। परिसीमन (delimitation) लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं जनसंख्या के आधार पर नए सिरे से तय करने की प्रक्रिया है। इसके लिए एक परिसीमन आयोग बनेगा, जो 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर  सीटों का बंटवारा करेगा और उनका क्षेत्र तय करेगा।

Advertisement

विपक्ष इसी बात का विरोध कर रहा है। उसका कहना है कि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का बंटवारा हुआ तो तमिलनाडु , केरल और कर्नाटक जैसे दक्षिण भारत के राज्यों को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

विपक्ष का कहना है कि दक्षिण के राज्य (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना) ने जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य में बेहतर काम किया, इसलिए उनकी जनसंख्या वृद्धि कम है। जबकि उत्तर भारत (UP, बिहार) की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में अगर सीटें जनसंख्या के आधार पर बांटी गईं तो उत्तर को अतिरिक्त सीटें मिलेंगी, जबकि दक्षिण की सांसदों की संख्या का अनुपात घट जाएगा। विपक्ष इसे "प्रगति की सजा" कह रहा है।

Advertisement

सरकार का क्या है कहना?

परिसीमन को लेकर विपक्ष के विरोध के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि कुछ लोग इस मुद्दे पर दक्षिण भारतीय राज्यों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि  कुछ लोग परिसीमन के गलत आंकड़े देकर दक्षिण भारतीय राज्यों को महिला आरक्षण के मुद्दे पर गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देने में राजनीति नहीं होनी चाहिए। सभी राजनीतिक दल नारी शक्ति के लिए एकजुट हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि संविधान संशोधन विधेयक से लोकसभा की कुल सीटों को 850 तक बढ़ाए जाने से दक्षिण भारत के राज्यों को भी पूरा फायदा मिलेगा। हर राज्य के चुनाव क्षेत्रों की संख्या उनकी जनसंख्या के हिसाब से अनुपातिक रूप से बढ़ाई जाएगी। कुछ लोगों ने दक्षिणी राज्यों को यह कहकर भ्रमित करने की कोशिश की थी कि परिवार नियोजन में उनकी सफलता की वजह से उन्हें नुकसान होगा। हकीकत यह है कि कोई भी राज्य घाटे में नहीं रहेगा।

यह भी पढ़ें: महिलाओं को आरक्षण, लोकसभा में 850 सीटें... आज संसद में पेश होंगे 3 बड़े बिल, 18 घंटे चलेगी मैराथन बहस; विपक्ष क्यों है विरोध में?

Published By :
Ruchi Mehra
पब्लिश्ड