बड़ी दीदी के 76वें जन्मदिवस पर जगद्गुरु कृपालु परिषत् के साधकों ने प्रकट किये हृदय उद्गार
बड़ी दीदी का 76वाँ जन्मदिवस हमारे लिए अनगिनत खट्टी-मीठी यादें लेकर आया है।
- भारत
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आप सुश्री डॉ. विशाखा त्रिपाठी जी (बड़ी दीदी) एवं उनकी दोनों प्रिय बहनों सुश्री डॉ. श्यामा त्रिपाठी जी (मँझली दीदी) एवं सुश्री डॉ. कृष्णा त्रिपाठी जी (छोटी दीदी) को विश्व के पाँचवें मूल जगद्गुरु, श्री कृपालु जी महाराज की पुत्रियों और जगद्गुरु कृपालु परिषत् की अध्यक्षाओं के रूप में जानते होंगे। हम जगद्गुरु कृपालु परिषत् के साधकों के हृदय में वो अति-विशिष्ट स्थान रखती हैं।
बड़ी दीदी का 76वाँ जन्मदिवस हमारे लिए अनगिनत खट्टी-मीठी यादें लेकर आया है। एक तरफ है उनके हमारे समक्ष शारीरिक रूप से उपस्थित न होने का असह्य दुःख तो दूसरी ओर हैं उनकी करुणा, प्रेम और अपनेपन की ढेरों स्मृतियाँ।
बड़ी दीदी कौन थीं? हमारे लिए तो वो एक ममतामयी माँ थीं जो हम बच्चों के हर सुख-दुःख में सदा हमारे साथ अडिग खड़ी रहीं, एक स्नेहमयी बड़ी बहन जो पग-पग पर, हर समस्या में हमारा हाथ थामे रहीं, एक मित्र जिससे हम अपने हृदय की कोई भी बात बेहिचक कह सकते थे, एक मार्गदर्शक जो हमारे भटके हुए मन को सदा सही दिशा दिखाती रहीं।
नित्य परिकर: हमारी बड़ी दीदी
अथाह ज्ञान अपने अंदर समाये हुए भी उन्होनें कभी अपनी विद्वत्ता नहीं प्रकट की, बस आम बोल-चाल की भाषा में हमें गुरु आदेशों का सदा स्मरण कराया। बार-बार बताया, बस वही तुम्हारे हैं। कभी कोई "बड़ी दीदी की जय" बोलता तो तुरंत उसे टोकतीं, कहतीं हम तो बस तुम्हारी दीदी हैं।
यह तो सारा विश्व जानता और मानता है कि श्री महाराज जी कौन हैं। जिन्होंने अथाह ज्ञान और भक्ति का महासागर विश्व के समक्ष प्रकट कर दिया। जिस प्रकार श्री महाराज जी ने करुणापूर्वक श्री राधा-कृष्ण का प्रेम जीवों को प्रदान किया, ऐसा तो स्वयं राधा-कृष्ण या उनका दिव्य प्रेम प्राप्त जन ही कर सकते हैं। फिर बड़ी दीदी जो सदा परछाईं की तरह श्री महाराज जी के साथ रहीं, जो उनके प्रेम-रस की समस्त रीतियों को जानती हैं, जिन्हें श्री महाराज जी ने अपनी अमूल्य सेवाएँ प्रदान कीं, लीला संवरण के बाद भी अपनी लीला विस्तार की सेवा दी, वे बड़ी दीदी कौन हो सकती हैं!
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बड़ी दीदी की दया और अपनत्व
अम्मा जी और श्री महाराज जी के अप्रत्यक्ष हो जाने के बाद, वो बड़ी दीदी, मँझली दीदी और छोटी दीदी का स्नेह ही है जो हम अधम जीवों का सबसे बड़ा सम्बल बना। स्वयं के लिए तो बड़ी दीदी ने एक श्वास भी कभी नहीं ली, अपना पूरा जीवन उन्होंने श्री महाराज जी के प्रति हमारे प्रेम को परिपक़्व करने में लगा दिया।
चाहे भारतीय साधक हों या विदेशी, सबको बड़ी दीदी का मधुर सान्निध्य प्राप्त होता रहा। एक-एक व्यक्ति का नाम लेकर उससे राधे-राधे कहना। जान बूझ कर ऐसी बातें करना जिससे सब खिलखिलाकर हँस पड़ें। न जाने कितनी ही ऐसी बातें हम साधकों के हृदय-पटल पर अंकित हैं जो आज भी हमें बड़ी दीदी के सतत सान्निध्य का अनुभव कराती रहती हैं।
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साधना शिविर में आने वाले सब साधकों से अति-प्रेमपूर्वक मिलना, उनका हाल-चाल पूछना। किसी से चाहे वो सालों बाद भी मिलें, उन्हें सब याद रहता। असीम प्यार-दुलार देकर उनका बस यही प्रयास रहता कि हर जीव सदा हरि-गुरु के निकट पहुँचता जाए।
ट्रस्ट और आश्रमों का कार्यभार सँभालना
जगद्गुरु कृपालु परिषत् ट्रस्ट और उसके आश्रमों की हर छोटी से छोटी चीज़ वे खुद चुनतीं। कौन सी वस्तु बच्चों को पसंद आएगी, किसकी गुणवत्ता सबसे अच्छी है, कौन सा भोजन सबसे पौष्टिक है, हर पैमाने पर गंभीर सोच-विचार करके, तमाम लोगों की राय लेकर, बड़ी दीदी हर निर्णय लेतीं। साल में कई बार आश्रमवासी बच्चों को स्वयं उपस्थित रहकर उनके लिए विशेष रूप से आर्डर किये गए कपड़े उन्हें देना, खुद देखना कि कौन सा कपड़ा किसकी नाप का है, गर्मी-सर्दी की हर छोटी-बड़ी आवश्यक वस्तु सबको बहुत प्यार से प्रदान करना, हर बच्चे से व्यक्तिगत रूप से बात करना। विश्व में वो कौन सी माँ होगी जो बड़ी दीदी के वात्सल्य का मुकाबला कर सके।
चाहे वे साधक हों, प्रचारकगण हों, आश्रमवासी हों या कार्यकर्ता हों, कैसे बड़ी दीदी के लाडले, हम छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर, बेहिचक, उनके पास पहुँच जाते। वे व्यस्त हैं, थक गयी हैं, उनकी तबियत खराब है - ये सब बातें हमारे दिमाग में कहाँ आतीं। हम तो बस उनकी ममता के पाश में बँधे हुए, उनके अपनेपन में मुग्ध, उनके निरंतर सान्निध्य का रसपान करते रहे।
वे कितने धैर्य से हमारी बातों को सुनतीं। अभिभावक की भाँति हमारी शंकाओं का समाधान करतीं, हमारी परेशानियों का हल बतातीं, और हमारे क्षुब्ध मन को शांत कर देतीं। जैसे उनके पास कोई जादू की छड़ी हो। कितने ही व्यथित होकर उनके पास पहुँचो, जब उनसे बात करके वापस आओ तो मन एकदम शांत होता और सेवा करने की एक तीव्र इच्छा उत्पन्न हो जाती।
स्वनाम-धन्य श्री विशाखा सखी
यह कहते हुए जीभ लड़खड़ाती है कि अब बड़ी दीदी दैहिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं। परंतु हम भली-भाँति जानते हैं कि हमारे क्या करने से उन्हें सबसे अधिक प्रसन्नता होगी। बड़ी दीदी ने बार-बार गुरु सेवा पर ज़ोर दिया - कि अपना पूरा मन लगाकर सेवा करो, अपने गुरुवर को प्रसन्न करने की चेष्टा करते रहो, श्वास श्वास से राधे नाम लेते रहो, समय थोड़ा है, मन को सदा हरि-गुरु मे ही लगाए रहो।
हे हमारे प्राणों से भी प्यारी बड़ी दीदी! अब तो यह जीवन हमें इन्हीं बातों का स्मरण करते हुए, गुरु सेवा मे लगाना है। और हम डंके की चोट पर, हृदय से यह बात आत्मसात करते हुए कहते हैं कि गुरु सेवा की इस शाश्वत यात्रा में आप पहले भी हमारी मार्ग दर्शक थीं, आज भी हैं, और सदा रहेंगी। जब कभी वो परम सौभाग्यशाली क्षण आएगा जब हम गुरुवर से मिलेंगे, तो आप ही तो हमें उनकी रस-रीति से परिचित कराएंगी। आप ही तो हमें बताएंगी कि हमारे प्रेमास्पद को कैसे सुख मिलता है और उनकी सेवा कैसे करनी है क्योंकि आप ही स्वनाम-धन्य श्री विशाखा सखी हैं।
कोटि-कोटि प्रणाम दीदी,
जगद्गुरु कृपालु परिषत् के साधक