मुंबई की चॉल से अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप तक! 7 युवा खिलाडि़यों ने भूटान में स्वर्ण पदक जीत रचा इतिहास; हर तरफ हो रही चर्चा
मुंबई की चॉल की तंग गलियों और सीमित संसाधनों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करने वाले सात युवा खिलाड़ियों की कहानी इन दिनों चर्चा में है।
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मुंबई की चॉल की तंग गलियों और सीमित संसाधनों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करने वाले सात युवा खिलाड़ियों की कहानी इन दिनों चर्चा में है। आर्थिक चुनौतियों और पर्याप्त सुविधाओं के अभाव के बावजूद इन खिलाड़ियों ने भूटान में आयोजित दक्षिण एशियाई बॉक्स-लंगड़ी चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए व्यक्तिगत स्वर्ण पदक हासिल किए।
ये सभी खिलाड़ी मुंबई की चॉल और झोपड़पट्टियों से ताल्लुक रखते हैं। सार्वजनिक मैदानों और संकरी गलियों में अभ्यास करके इन्होंने ये मुकाम हासिल किया है। प्रशिक्षण की उचित सुविधा और आर्थिक मदद के अभाव के बावजूद इन्होंने हार नहीं मानी। कड़ी मेहनत और लगन से इन्होंने न सिर्फ अपना सपना पूरा किया, बल्कि देश के लिए गौरव भी बढ़ाया।
चॉल से निकले ये 7 चैंपियन
भारत के लिए स्वर्ण जीतने वाले खिलाड़ी हैं, विराज भिलारे, गौरव सोनावणे, ऋग्वेद राहुल मोहिते, प्रथमेश चव्हाण, श्री धाधम, प्रथमेश पगारे और ऋषभ इंगले। इन सातों ने अपने-अपने वर्ग में पहला स्थान हासिल कर भारत को ओवरऑल चैंपियन बनने में अहम भूमिका निभाई।
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महाराष्ट्र बीजेपी चीफ रविंद्र चव्हाण ने की सराहना
महाराष्ट्र भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर इनके संघर्ष और जीत की सराहना की। इसके बाद मामला चर्चा में आया। उन्होंने कहा कि चॉल से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतना इन युवाओं की मेहनत और देशभक्ति का प्रतीक है। चव्हाण ने कहा, इन सात एथलीटों ने न सिर्फ निजी गोल्ड मेडल जीते बल्कि भारत के लिए चैंपियनशिप ट्रॉफी भी हासिल की।" उन्होंने शानदार प्रदर्शन करके गर्व के साथ भारत का तिरंगा ऊंचा किया।
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सात खिलाड़ियों की जीत क्यों खास है?
इन सातों खिलाड़ियों की कहानी इसलिए प्रेरणादायक है क्योंकि यह दिखाती है कि खेल प्रतिभा हमेशा महंगी सुविधाओं और बड़े प्रशिक्षण केंद्रों की मोहताज नहीं होती। सही दिशा, निरंतर अभ्यास और अपने लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता हो तो सीमित साधनों से भी खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकते हैं। इन युवाओं ने चॉल से निकलकर भूटान में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीते हैं। उनकी सफलता उन तमाम बच्चों और युवाओं के लिए उम्मीद की कहानी है, जो आर्थिक चुनौतियों या सुविधाओं की कमी के बावजूद खिलाड़ी बनने का सपना देखते हैं।