अपडेटेड 16 January 2026 at 15:02 IST
'7 साल की उम्र में पहली बार राष्ट्र गान गाया, तो बच्चे मुझे अपनी कैंडी देने लगे तो...', मामे खान ने बताया कैसे हुई गायक बनने की शुरुआत
Republic Bharat Sangam 2026 : मामे खान, राजस्थान की 'लोक आवाज' का वो जीता-जागता सूरज हैं, जिसकी एक थाप पर पूरा रेगिस्तान थिरक उठता है! 'संगम- साहित्य, सुर और शक्ति' के मंच पर उन्होंने बताया कि कैसे गायक बनने की शुरुआत हुई।
- भारत
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Republic Bharat Sangam 2026 : रिपब्लिक मीडिया हाउस में शुक्रवार को 'संगम- साहित्य, सुर और शक्ति' का मंच सजा तो साहित्य, कला, संगीत, राजनीति और मनोरंजन जगत के दिग्गजों ने अपने अनुभवों से समा बांध दिया। 'संगम' के 'पधारो सा' सेशन में राजस्थान की लोक आवाज मामे खान (Mame Khan) ने अपनी बुलंद आवाज से ऐसी छापा छोड़ी कि तालियों की गड़गड़ाहट नहीं रुकी।
'संगम- साहित्य, सुर और शक्ति' के मंच पर मामे खान ने अपने जीवन के कई अनुभव साझा किए, उन्होंने बताया कि उन्होंने गायकी की शुरुआत कैसे की थी। मामे खान ने अपनी सुरीली आवाज में 'केसरिया बालम...' और 'लुक-छिप ना जाओ जी' समेत कई गीत सुनाए और कहानी अपनी जिंदगी के कई दिलचस्प किस्से भी सुनाए।
कैसे हुई गायक बनने की शुरुआत?
मामे खान ने बताया कि वे गाते-गाते ही बड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि जब वो 7 साल के थे, तब स्कूल में पहली बार 15 अगस्त पर राष्ट्र गान गाया था। यहीं से उनके गाने की शुरुआत हुई। उन्होंने बताया कि मेरा राष्ट्र गान सुनने के बाद कई बच्चों ने मुझे खुश होकर अपनी कैंडी (टॉफी चॉकलेट) मुझे दे दी थी।
उन्होंने बताया कि 1999 में वो ढोल वादक के रूप में 37 देशों के वर्ल्ड टूर पर गए थे। इसी दौरान उनका ढोल गलती से विदेश में ही छूट गया था। जब एयरपोर्ट में पिताजी ने पूछा कि ढोल कहां है? पिता का सवाल सुनकर मामे खान थोड़े घबरा गए, उनके पिता भी समझ गए कि बेटा ढोल को विदेश में ही छोड़ आया है। इसके बाद उनके पिता ने कहा कि जब तुम ढोल छोड़ ही आए हो तो अब मेरे साथ गाना शुरू करो और इस तरह उनके गाने की शुरुआत हुई।
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कौन हैं मामे खान?
मामे खान, राजस्थान की 'लोक आवाज' का वो जीता-जागता सूरज हैं, जिसकी एक थाप पर पूरा रेगिस्तान थिरक उठता है! जैसलमेर के छोटे से गांव सत्तों से निकलकर उन्होंने वो मुकाम हासिल किया है, जहां पद्मश्री मिलना और कान्स फिल्म फेस्टिवल की रेड कार्पेट पर पहली बार किसी भारतीय लोक कलाकार के रूप में चलना भी इतिहास बन गया।
'केसरिया बालम आवोनी... पधारो म्हारे...' सुनते ही मन में रेत के टीले, ऊंटों की कतार और रेगिस्तान की वो खुशबू ताजा हो जाती है। उनकी आवाज में वो मिठास है जो सीधे दिल तक उतर जाती है। बॉलीवुड में 'सोनचिरैया', 'लक बाय चांस', 'नो वन किल्ड जेसिका' जैसी फिल्मों में उन्होंने राजस्थानी लोक को नई पहचान दी।
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सबसे खास बात ये है कि उन्होने कभी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। मांगणियार परंपरा की पीढ़ी के इस 'उस्ताद' ने लोक संगीत को न सिर्फ जिंदा रखा, बल्कि उसे दुनिया के बड़े-बड़े मंचों तक ले गए। मामे खान सिर्फ गायक नहीं, बल्कि राजस्थानी संगीत की जीती-जागती आत्मा हैं।
'संगम' को कामयाब बनाने में कई स्पॉन्सर आगे आए हैं, जिसके लिए हम उन्हें धन्यवाद देते हैं।
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Published By : Sagar Singh
पब्लिश्ड 16 January 2026 at 14:54 IST