न सिंबल बचा, न उम्मीदवार... जिसे दिया समर्थन वो भी गिरफ्तार, अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं ममता बनर्जी; EC के फैसले को दी चुनौती

ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने पार्टी का नाम और सिंबल फ्रीज किए जाने और पार्टी में टूट के खिलाफ चीफ जस्टिस की पीठ के समक्ष दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं, जिसमें तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है।

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Mamata Banerjee moves Supreme Court
Mamata Banerjee moves Supreme Court | Image: ANI

Mamata Banerjee moves SC against EC: पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। उन्होंने चुनाव आयोग के पार्टी का नाम और सिंबल फ्रीज किए जाने के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

यह पूरा घटनाक्रम 6 अक्टूबर को होने वाले आगामी उपचुनावों से ठीक पहले तेजी से बढ़ती राजनीतिक सरगर्मियों के बीच सामने आया है। इस राजनीतिक विवाद में आपस में जुड़ी तीन बड़ी घटनाएं शामिल हैं। इसकी शुरुआत निर्वाचन आयोग (ECI) के तृणमूल कांग्रेस के पारंपरिक नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज करने से हुई। इसके बाद ममता बनर्जी गुट को एक और बड़ा झटका लगा, जब नंदीग्राम सीट से उनकी पार्टी की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने सीएम सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद अचानक अपना नाम वापस ले लिया।

ममता ने जिसे समर्थन दिया वो गिरफ्तार

इस सियासी घमासान के बीच कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान की एक पुराने हत्या के मामले में हुई अचानक गिरफ्तारी ने आग में घी का काम किया। दरअसल, ममता बनर्जी के मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान करने के कुछ घंटे बाद ही उनकी गिरफ्तारी हो गई।

सुप्रीम कोर्ट का किया रुख

इन सभी घटनाक्रमों के बीच ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं। उन्होंने पार्टी का नाम और सिंबल फ्रीज किए जाने और पार्टी में टूट के खिलाफ चीफ जस्टिस की पीठ के समक्ष दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं, जिसमें तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है।

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EC के फैसले को दी चुनौती

पहली याचिका में निर्वाचन आयोग के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) के नाम और चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि चुनाव आयोग ने पार्टी के बहुसंख्यक कैडर और बुनियादी संगठनात्मक ढांचे को नजरअंदाज किया है। आयोग ने बागी गुट के दावों को अनुचित प्राथमिकता दी है। दूसरी याचिका में पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष द्वारा 10 बागी विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने में की जा रही अत्यधिक देरी पर सवाल उठाए गए हैं। ममता गुट का तर्क है कि जब तक इन 10 बागी विधायकों की विधानसभा सदस्यता पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक उनके समर्थन या दावों के आधार पर पार्टी के नाम और सिंबल का बंटवारा करना या उस पर रोक लगाना पूरी तरह से असंवैधानिक है। गौरतलब है कि दोनों गुटों के बीच यह कानूनी विवाद इस साल जुलाई से चुनाव आयोग के सामने लंबित है।

नंदीग्राम में उपचुनाव से पहले घमासान

जैसे-जैसे 6 अक्टूबर को होने वाला उपचुनाव नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे नंदीग्राम का उपचुनाव अब एक आम उपचुनाव से कहीं ज्यादा बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन गया है। इसमें पार्टी की पहचान, चुनाव चिह्न, विपक्ष की एकता, पुराने प्रतिद्वंद्वियों के बीच अप्रत्याशित गठबंधन और चुनावी और कानून लागू करने वाली संस्थाओं के कामकाज को लेकर एक-दूसरे के खिलाफ दावे जैसे मुद्दे शामिल हैं।

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6 अक्टूबर को मतदान, 9 को मतगणना

बता दें कि पश्चिम बंगाल की रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा सीटों पर उपचुनाव 6 अक्टूबर को होंगे। जबकि मतगणना 9 अक्तूबर को की जाएगी। नंदीग्राम सीट सीएम सुवेंदु अधिकारी और रेजीनगर सीट आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के संस्थापक हुमायूं कबीर के इस्तीफे के बाद खाली हुई है।

सुवेंदु अधिकारी ने विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था और जबरदस्त जीत भी पाई थी। उन्होंने भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी को हराया था। इसके बाद उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखी और नंदीग्राम के विधायक पद से इस्तीफा दे दिया।

यह भी पढ़ें: पहले करारी हार, फिर पार्टी छीनी, सिंबल छीना... विधानसभा चुनाव में 'खेला होबे' नारे से आगाज करने वाली ममता बनर्जी का बंगाल में कैसे हो गया 'खेला'?
 

Published By:
 Priyanka Yadav
पब्लिश्ड