'हमारी बेटी अजनबी के बहकावे में कैसे आ सकती है?', लव जिहाद पर RSS प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा- 'परिवार से शुरू हो रोकथाम'
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने लव जिहाद पर कहा कि परिवार रोकथाम शुरू होनी चाहिए। हमारी संस्कृति की रक्षा में महिलाओं की अहम भूमिका है। लव जिहाद रोकने के लिए मोहन भागवत ने तीन अहम कदम के बारे में बताया।
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सत्य विजय सिंह की रिपोर्ट
Mohan Bhagwat News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से भोपाल के शिवनेरी भवन में आयोजित 'स्त्री शक्ति संवाद' कार्यक्रम को मोहन भागवत ने संबोधित किया। कार्यक्रम के मंच पर अशोक पांडेय और सोमकांत उमालकर भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में 'नारी तू ही नारायणी' के भाव को केंद्र में रखकर बातचीत को आगे बढ़ाया गया। RSS प्रमुख मोहन भागवत ने लव जिहाद को रोकने के लिए परिवार की भूमिका पर खास जोर देते हुए संबोधित किया। उन्होंने कहा कि इस समस्या की शुरुआत घरों से होती है। जहां संवाद की कमी के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। भागवत के मुताबिक, हमारा धर्म, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था महिलाओं की वजह से ही सुरक्षित है।
लव जिहाद रोकने के तीन कदम
मोहन भागवत ने भोपाल में एक कार्यक्रम में कहा कि परिवार के सदस्यों के बीच मेलजोल और बातचीत न होने से बेटियां बहकावे में आ जाती हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अगर घर में नियमित संवाद हो, तो धर्म और परंपरा के प्रति सम्मान खुद-ब-खुद विकसित होता है। RSS प्रमुख ने लव जिहाद रोकने के लिए तीन मुख्य कदम सुझाए, जिसमें परिवार के अंदर निरंतर संवाद बढ़ाना, लड़कियों में सावधानी और आत्मरक्षा की भावना पैदा करना। साथ ही ऐसे अपराध करने वालों के खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
लैंगिक भेदभाव पर क्या बोले मोहन भागवत?
मोहन भागवत ने कहा, 'जब हम सभ्य समाज की बात करते हैं तो उसमें महिलाओं की भूमिका खुद ही केंद्रीय हो जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति और हमारी सामाजिक व्यवस्था महिलाओं के कारण ही सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि अब वह समय चला गया जब महिलाओं को सिर्फ सुरक्षा की दृष्टि से घर तक सीमित रखा जाता था। आज परिवार और समाज दोनों को स्त्री और पुरुष मिलकर आगे बढ़ाते हैं, इसलिए दोनों का प्रबोधन आवश्यक है।'
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लैंगिक भेदभाव और उत्पीड़न को लेकर भागवत ने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि पश्चिमी समाज में महिला का स्थान विवाह के बाद तय होता है, जबकि भारतीय परंपरा में महिला का स्थान मातृत्व से और ज्यादा ऊंचा हो जाता है। मातृत्व हमारे संस्कारों का मूल है।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता की आड़ में जो पश्चिमीकरण थोपा जा रहा है, वह एक अंधी दौड़ है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि हम बचपन से बच्चों को क्या संस्कार दे रहे हैं, इस पर गंभीरता से विचार करें। महिलाओं को आत्मसंरक्षण के लिए सक्षम बनना चाहिए, क्योंकि हमारी परंपरा महिलाओं को सीमित नहीं बल्कि सशक्त और असाधारण बनाती है। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय नारी ने हर काल में शक्ति और साहस का परिचय दिया है।