अपडेटेड 25 March 2026 at 13:36 IST
Chhattisgarh : 3 बार 'मर' चुके 25 लाख के इनामी पापा राव ने किया सरेंडर, छोटे कद वाले खूंखार नक्सली को कैसे मिला ये अजीब नाम?
छत्तीसगढ़ के बीजापुर में एक बड़ी सफलता हासिल हुई है। अंतिम वरिष्ठ माओवादी कमांडर पापा राव ने 17 साथियों समेत सुरक्षा बलों के सामने सरेंडर कर दिया। जानें छोटे कद वाले खूंखार इस खुंखार नक्सली को कैसे मिला पापा राव नाम?
- भारत
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Naxal Commader Papa Rao Surrender: छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सलवाद विरोधी अभियानों में एक बड़ी सफलता हासिल हुई है। बस्तर क्षेत्र के अंतिम सक्रिय सबसे बड़े माओवादी कमांडर पापा राव उर्फ सुन्नम चंद्रैया उर्फ मंगू दादा ने अपने 17 साथियों के साथ सुरक्षा बलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इस घटना को बस्तर में नक्सल समस्या के अंत के करीब पहुंचने का बड़ा संकेत माना जा रहा है।
पापा राव दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) का सदस्य था और साउथ सब जोनल ब्यूरो के प्रभारी के रूप में जिम्मेदार था। वो लगभग 30 साल से माओवादी आंदोलन से जुड़ा हुआ था। 1997 में स्कूल ड्रॉपआउट के बाद इस आंदोलन में शामिल हुआ। जिसपर 45 से अधिक मामले दर्ज है, जिनमें 2010 का तादमेटला हमला जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे और जनवरी 2025 का अंबेली हमला जिसमें 8 सुरक्षाकर्मी और एक आम नागरिक मारा गया शामिल हैं। उसके सिर पर 25 लाख रुपये का इनाम घोषित था।
सरेंडर के दौरान पापा राव ने कहा, “भारत के संविधान के अनुसार, हम लोगों के अधिकारों के लिए, पानी और जमीन के लिए लड़ेंगे। मैं हथियार डाल दूंगा और संविधान के ढांचे के भीतर काम करूंगा।” अब वो मुख्यधारा में लौटकर लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से जनता की आवाज उठाने के लिए काम करेंगे।
8 AK-47 समेत कई राइफल सरेंडर
सरेंडर करने वाले कुल 18 माओवादियों में डिविजनल कमेटी के सदस्य प्रकाश मडवी और अनिल टाटी भी शामिल हैं। इस माओवादी ग्रुप ने 8 AK-47 राइफलें, एक SLR, एक इंसास राइफल और अन्य हथियार पुलिस को सौंपे। सरेंडर कुटरू पुलिस स्टेशन पर हुआ, जिसके बाद उन्हें जगदलपुर ले जाया गया।
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पापा राव नाम कैसे मिला?
1994 में माओवादी संगठन से जुड़े पापा राव का असली नाम सुन्नम चंद्रया है। जब वो संगठन से जुड़ने के बाद नक्सली कमांडर रमन्ना उर्फ रावलु श्रीनिवास की टीम में शामिल हुआ, तो रमन्ना ने ही उसका नाम पापा राव रखा। इसके बाद धीरे-धीरे उसका नाम बड़ा होता गया और 25 अब लाख रुपये का इनाम है। हिडमा के मारे जाने के बाद उसे इलाके का सबसे अनुभवी और खतरनाक कमांडर माना जाता है।
सरेंडर से पहले कई बार फैली मौत की खबर
सुरक्षा बलों को चकमा देने में पापा राव को महारत हासिल है। उसने कई बार अपने मंसूबों को अंजाम देने के लिए खुद के मरने की अफवाह उड़ाई। 3 बार तो ऐसा हुआ कि लोगों ने मान ही लिया कि पापा राव मारा गया। साल 2015-2016 में बस्तर में नक्सली संगठन पर जब सुरक्षा बलों का दबाव बढ़ा, तो जुलाई 2016 में सुकमा से खबर फैली कि कमांडर पापा राव को सांप ने काट लिया है और उसकी मौत हो गई। इंटेलिजेंस की मदद से पता चला कि वो जिंदा है।
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इसके बाद मैं 2020 में फिर से खबर आई कि किडनी की बीमारी से पापा राव की मौत हो गई, लेकिन ये भी झूठ साबित हुई। इसके बाद कोरोना काल में सूचना मिली कि पापा राव किडनी फेल होने से मर गया है, लेकिन बात के कुछ मुठभेड़ में पापा राव की भूमिका सामने आई। इसी साल बीजापुर में एक मुठभेड़ के दौरान भी खबर आई कि पापा राव मारा गया, लेकिन उसने अब सरेंडर किया है।
अमित शाह की मुहिम का असर
यह सरेंडर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा तय 31 मार्च 2026 की डेडलाइन से ठीक एक सप्ताह पहले हुआ है, जिसके तहत बस्तर को नक्सल मुक्त घोषित करने का लक्ष्य रखा गया है। सुरक्षा बलों के निरंतर अभियानों, सख्त कार्रवाई और पुनर्वास नीति के संयुक्त प्रभाव से बड़ी संख्या में नक्सली पहले ही मुख्यधारा में लौट चुके हैं। पापा राव जैसे प्रभावशाली नेता के सरेंडर से बस्तर में लाल आतंक का अंत नजदीक है।
इसके बाद छोटे-छोटे समूहों के सदस्य भी जल्द ही हथियार डाल सकते हैं। सरकार अब सरेंडर करने वालों को पुनर्वास पैकेज, सुरक्षा और रोजगार के अवसर प्रदान करेगी ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें।
Published By : Sagar Singh
पब्लिश्ड 25 March 2026 at 13:36 IST