अपडेटेड 16 March 2026 at 19:58 IST

Harish Rana: हरीश राणा की इच्छा मृत्यु में कितना समय लगेगा, परिवार का क्या है रोल? AIIMS की पूर्व HoD ने बताया, कहा- ऐसा न लगे कि जान-बूझकर...

करीब 13 साल से अचेत अवस्था में पड़े हरीश राणा का लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया एम्स में शुरू हो चुकी है। बताया जा रहा है कि उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम से जुड़े दो महत्वपूर्ण पाइप को पहले चरण में हटा दिया गया है।

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Harish Rana
Harish Rana | Image: Republic

Harish Rana: पिछले 13 सालों से कोमा में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हरीश राणा अब अपने जीवन के अंतिम सफर पर हैं। सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिया इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद उन्हें दिल्ली के एम्स में शिफ्ट किया जा चुका है। डॉक्टरों की निगरानी में उनका लाइफ सपोर्ट धीरे-धीरे हटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अब इस मामले पर एम्स की पूर्व विशेषज्ञ सुषमा भटनागर ने अपनी प्रतिक्रिया दी है।

एम्स दिल्ली के ऑन्को-एनेस्थीसिया, दर्द और पैलिएटिव केयर विभाग की पूर्व प्रमुख डॉ. सुषमा भटनागर का कहना है कि जब कोई अपनी मरीज ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है जहां जीवन का अंत निश्चित है, तब इलाज से अधिक जरूरी उसकी पीड़ा को कम करना है।

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अंत को लंबा न खिंचे- डॉ. सुषमा

उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे मुश्किल समय में मरीज को सिर्फ मशीनों के सहारे रखने के बजाय भावनात्मक सहारा देना और उनके अंतिम समय को कष्टमुक्त बनाना जरूरी है।

डॉ. सुषमा भटनागर कहती हैं, 'उपशामक देखभाल चिकित्सक(Palliative Care Physician) का काम किसी भी स्टेज के मरीज को कंफर्ट केयर देना होता है। इस मामले में यह एक ऐसी गंभीर स्थिति है जहां ऐसा लगता है कि अंत निश्चित है यानी मृत्यु होनी ही है। ऐसी स्टेज में हमने पिछले 3 दशकों में प्रैक्सिट की है, जहां हमें लगता है कि मरीज नहीं बच पाएगा, तो हमारी कोशिश होती है, उसमें कोई यूथेनेसिया (Euthanasia) शब्द नहीं होता, बल्कि एक अच्छा उपशामक देखभाल चिकित्सक होता है, वो हर संभव कोशिश करता है कि उसके अंत को लंबा न खिंचे। कोई सा भी सपोर्ट देकर हम जो अंत को खिंचते हैं, वो नहीं हो और उसकी मृत्यु को दवाईयां देकर खिंचे नहीं। उपशामक देखभाल चिकित्सक ऐसा नहीं करता है।'

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'कितने दिन लगेंगे बताना मुश्किल...'

उन्होंने आगे कहा, 'अगर ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहां पर अंत निश्चित हो, जैसा कि इस बच्चे के मामले में है तो हमें अंत तक उसका इस तरह से साथ देना चाहिए कि यह सुनिश्चित हो सके कि उसे लगातार देखभाल मिलती रहे। अब, 13 सालों तक उसे देखभाल प्रदान करने के बाद, भारत सरकार के पास देखभाल रोकने और हटाने (withholding and withdrawal) के लिए दिशानिर्देश मौजूद हैं। इन दिशानिर्देशों का पालन किया जाना चाहिए। यह बताना मुश्किल है कि इसमें कितने दिन लगेंगे, क्योंकि यह किसी के भी हाथ में नहीं होता। हम जानते हैं कि यदि हमें इस मामले में देखभाल रोकनी या हटानी है, तो हमें यह बहुत ही संतुलित तरीके से करना होगा। ताकि हमें ऐसा न लगे कि हमने जान-बूझकर किसी की हत्या जैसा कोई काम किया है।'

अचेत हालत में कैसे पहुंचे हरीश राणा?

2013 में चंडीगढ़ में रहकर पढ़ाई करते हुए हरीश राणा पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उन्हें शरीर के कई हिस्सों में गंभीर चोट आई थी। सिर की चोट की वजह से 100% क्वाड्रिप्लेजिया हो गई। पिछले 13 साल से राणा क्वाड्रिप्लेजिया (चारों अंगों का लकवा) से पीड़ित हैं।

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हरीश पिछले 13 सालों से सिर्फ मशीनों के सहारे जी रहे हैं। एम्स की मेडिकल टीम ने अपनी रिपोर्ट में कह दिया था कि उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं बची है। ऐसे में अपने बेटे को हर दिन तड़पते देख माता-पिता ने भी अपने दिल पर पत्थर रख लिया और कोर्ट से उनके लिए इच्छामृत्यु की गुहार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। इसके बाद अब हरीश राणा सम्मानजनक और दर्दरहित अंतिम यात्रा की ओर हैं।

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Published By : Priyanka Yadav

पब्लिश्ड 16 March 2026 at 19:58 IST