'मेरे पति STF में थे, नक्सलियों ने मार डाला...', नक्सल हिंसा पीड़तों के परिवार का चिदंबरम के 'दिमागी नक्सल होने पर गर्व' वाले बयान पर फूटा गुस्सा
पीएम मोदी के दिमागी नक्सल वाले बयान पर पलटवार करते हुए कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने कहा था कि उन्हें दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। इसके इस बयान के बाद देश में बवाल मच गया है।
- भारत
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P. Chidambaram on Dimagi Naxals: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के 'दिमागी नक्सल' वाले एक बयान पर छत्तीसगढ़ के नक्सल हिंसा पीड़ितों ने गहरा आक्रोश जताया है। उनका कहना है कि ऐसे बयानों से उन लोगों को दुख पहुंचा है जिन्होंने नक्सली हमलों में अपने प्रियजनों को खोया है।
दरअसल, पी चिदंबरम ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा था कि वे 'दिमागी नक्सलियों' के साथ खड़े हैं और उन्हें उन पर गर्व है। उनके इसी बयान पर बवाल मच गया है। आज 'बस्तर शांति समिति' के बैनर तले छत्तीसगढ़ के बस्तर और कांकेर जिलों से दिल्ली पहुंचे दर्जनों पीड़ितों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसी दौरान उन्होंने चिदंबरम के बयान पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई।
पीड़ितों ने सुनाई आपबीती
पीड़ितों ने चिदंबरम के 'दिमागी नक्सली' वाले पोस्ट का विरोध करते हुए अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि कैसे नक्सली हमलों और IED धमाकों में उन्होंने अपने परिवार के सदस्य खो दिए। छत्तीसगढ़ के कांकेर के रहने वाले कामेश्वर कुमार सिन्हा ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा, 'पी. चिदंबरम का बयान देखकर मुझे सचमुच बहुत दुख हुआ। एक बार बस्तर जाकर देखिए। वहां कोई बयानबाजी नहीं कर रहा है, बल्कि वे वहां पीड़ितों और जवानों के साथ खड़े हैं।'
पिता को खो चुके कामेश्वर ने जताया विरोध
उन्होंने बताया कि नक्सलियों के किए गए आईडी धमाके में उन्होंने अपने पिता को खो दिया है। उन्होंने कहा कि देश की राजधानी से ऐसे बयानों का आना पीड़ितों के जख्मों को गहरा कर देता है। इसलिए मैंने सोचा कि मुझे दिल्ली आकर उनसे पूछना चाहिए कि वे ऐसा कैसे कह सकते हैं।'
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पति को खोने वाली आरती क्या बोलीं?
इसके अलावा बस्तर के कांकेर की रहने वाली आरती ने कहा, 'मेरे पति STF जवान थे। सुकमा में नक्सलियों के हमले में उनकी जान चली गई। हम सोशल मीडिया पर पी. चिदंबरम की उस बात का विरोध करते हैं जिसमें वे 'दिमागी नक्सलियों' का समर्थन की बात कह रहे हैं। बस्तर में मेरे जैसी कई महिलाएं हैं जिन्होंने अपने पति खोए हैं। आज बस्तर नक्सल-मुक्त की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन दिल्ली में कुछ नेता बैठे हैं जो ऐसी बातें कह रहे हैं। इसलिए, हम यहां आए हैं। मैं नहीं चाहती कि पहले जो हुआ, वह दोबारा हो।'
क्या बस्तर को तरक्की नहीं करनी चाहिए?- तरुण
कांकेर के निवासी तरुण कुमार ने कहा कि बस्तर करीब चार दशक तक नक्सली हिंसा की आग में जलता रहा है। एक नक्सली हमले में उन्होंने अपना पैर खो दिया और उनकी रीढ़ की हड्डी भी टूट गई। उन्होंने कहा कि बस्तर में शांति कायम करने के लिए हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई है। अब जब क्षेत्र विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, तो उसे फिर हिंसा के दौर में नहीं धकेला जाना चाहिए। वे कहते हैं, 'क्या बस्तर को तरक्की नहीं करनी चाहिए? बिल्कुल करनी चाहिए। ऐसे बयानों से बस्तर फिर 40 साल पीछे चला जाएगा, जहां हिंसा और गोलीबारी होगी और जवान अपनी जान गंवाएंगे।'
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तरुण ने आगे बताया कि उनके साथ 9 अक्टूबर 2022 को नक्सली हिंसा की घटना हुई थी। इस घटना के करीब चार साल होने को हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग नक्सली हिंसा के शिकार हुए हैं। ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि राजनीतिक नेता पीड़ितों के साथ खड़े होंगे।
सियाराम ने भी जताई नाराजगी
नक्सलवाद से प्रभावित सियाराम ने भी चिदंबरम के बयान पर अपना आक्रोश जाहिर किया। उन्होंने कहा कि बस्तर अब शांति और विकास की ओर बढ़ रहा है, लेकिन 'दिमागी नक्सल' जैसे बयान पीड़ित लोगों को दुख पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें हमारे साथ खड़ा होना चाहिए था, लेकिन वे उनके समर्थन में बोल रहे हैं। ऐसे बयान नहीं दिए जाने चाहिए।'
क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कहा था कि जहां जंगलों में हथियार उठाने वाले नक्सलियों को खत्म कर दिया गया है, वहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में 'दिमागी नक्सल' भी मौजूद हैं जिनकी पहचान करके उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत है। पीएम मोदी के इसी बयान की कई विपक्षी नेताओं ने आलोचना की। इसके बाद चिदंबरम ने X पर पोस्ट कर कह था कि मुझे 'दिमागी नक्सल' होने पर गर्व है!
कांग्रेस और चिदंबरम ने 'दिमागी नक्सल' शब्द की आलोचना करते हुए इसे बीजेपी द्वारा अपने विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल की जाने वाली एक राजनीतिक 'गाली' बताया। हालांकि, पीड़ितों के परिवारों का कहना है कि टिप्पणी करने से पहले बस्तर के उन लोगों के अनुभवों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए जिन्होंने बरसों तक नक्सली हिंसा का सामना किया है और हमलों में अपने परिवार के सदस्यों को खोया है।