'माइनिंग पहले से चल रही थी, अब खनन के लिए...', अरावली विवाद पर पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का बड़ा बयान, बोले-संरक्षण की आवश्यकता है

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने अरावली पहाड़ियों के इलाकों में माइनिंग लीज के बारे में कहा, "नई माइनिंग के लिए सुप्रीम कोर्ट का प्लान है कि पहले एक साइंटिफिक प्लान बनेगा इसमें ICFRE शामिल होगा। उसके बाद ही इस पर विचार किया जाएगा।

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Bhupendra Yadav statement on Aravalli dispute
अरावली विवाद पर भूपेंद्र यादव | Image: ANI/X

अरावली पहाड़ी श्रृंखला पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। देश के कई राज्यों में लोग एकजुट होकर अरावली को बचाने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। अब केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने पूरे विवाद पर खुलकर बातचीत की है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर अरावली को लेकर गलत जानकारी फैलाई जा रही है, जो गलत है। मंत्री ने कहा जो फैसला कोर्ट ने लिया है वो अरावली के संरक्षण के लिए जरूरी है।

न्यूज एजेंसी ANI को दिए एक इंटरव्यू में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, "अरावली रेंज सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। हम प्रतिबद्ध हैं कि ये पर्वत श्रृंखलाएं हरी-भरी रहनी चाहिए। हमने ग्रीन अरावली वॉल मूवमेंट भी चलाया अरावली की परिभाषा सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दो बातें कहीं, जिन्हें लोग छिपा रहे हैं। पहला, पहले ही पैराग्राफ में, उन्होंने पर्यावरण, वन मंत्रालय के ग्रीन अरावली वॉल मूवमेंट की सराहना की।

अरावली का 90% भाग सुरक्षित है- भूपेंद्र यादव

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानकारी देते हुए भूपेंद्र यादव ने कहा, कोर्ट ने दूसरे पैराग्राफ में कहा कि अरावली पहाड़ी और अरावली रेंज क्या होती हैं? दुनिया भर के भूविज्ञान में काम करते हैं, रिचर्ड मर्फी की एक मानक परिभाषा मानी जाती है कि 100 मीटर ऊंची पहाड़ी को पर्वत माना जाता है। 90% भाग सुरक्षित है। अरावली रेंज में खनन गतिविधि केवल 0.19% क्षेत्र में ही हो पाएगी, जो एक प्रतिशत से भी कम है, और वहां भी खनन खोला नहीं गया है।"

सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलाई गई-भूपेंद्र यादव

अरावली पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री  भूपेंद्र यादव ने कहा, अरावली क्षेत्र का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा संरक्षित क्षेत्र में ही रहेगा। अरावली रेंज चार राज्यों में फैली हुई है, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात। इससे जुड़ी एक याचिका 1985 से कोर्ट में लंबित है। कुछ YouTube चैनल 100 मीटर की रेंज को ऊपर के 100 मीटर के रूप में गलत समझ रहे हैं, जो सच नहीं है। 100 मीटर का मतलब पहाड़ी के ऊपर से नीचे तक फैलाव है, और दो रेंज के बीच के गैप को भी अरावली रेंज का हिस्सा माना जाएगा।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्देश अरावली को बचाने के लिए

इस परिभाषा के साथ, 90 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षित क्षेत्र के तहत आता है। अरावली क्षेत्र लगभग 1.47 लाख वर्ग किलोमीटर है। केवल लगभग 217 वर्ग किलोमीटर, लगभग दो प्रतिशत, खनन के लिए योग्य है। इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सस्टेनेबल माइनिंग के लिए एक मैनेजमेंट प्लान तैयार किया जाए। उसके बाद, किसी भी गतिविधि को आगे बढ़ाने से पहले ICFRE से अनुमति लेनी होगी। खनन पर कड़ा नियंत्रण रहेगा।

 माइनिंग के लिए साइंटिफिक प्लान बनेगा

दिल्ली अरावली में खनन पूरी तरह से प्रतिबंधित है। दिल्ली में सभी संरक्षित क्षेत्र और वन भंडार वैसे ही रहेंगे जैसे वे हैं। हमारी सरकार पिछले दो सालों से ग्रीन अरावली कार्यक्रम चला रही है। हम अरावली के बारे में बहुत चिंतित हैं, और एक झूठी कहानी बनाई जा रही है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की केंद्र की परिभाषा को स्वीकार किया और सस्टेनेबल माइनिंग के लिए सिफारिशों को मंजूरी दी। सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय को अरावली क्षेत्र में अनुमत क्षेत्रों की पहचान करने, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करने और अवैध खनन को रोकने के लिए सस्टेनेबल माइनिंग के लिए एक साइंटिफिक प्लान बनेगा, इसमें ICFRE शामिल होगा। उसके बाद ही इस पर विचार किया जाएगा।
 

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Published By:
 Ankur Shrivastava
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