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Updated May 14th, 2024 at 16:25 IST

De-Addiction Campaign: नशे के खिलाफ दिगराज सिंह का बड़ा कदम, शाहपुरा में शुरू किया नशामुक्ति अभियान

नशे की लत न सिर्फ युवाओं के भविष्य को खोखला कर रही है, बल्कि यह देश के माहौल को भी खराब कर रही है। ऐसे में इससे निपटने के लिए दिगराज सिंह ने बड़ा कदम उठाया है।

Digraj Singh
नशे के खिलाफ बड़ा कदम | Image:X
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Digraj Singh Shahpura Started De-Addiction Campaign: शाहपुरा मादक द्रव्यों के सेवन पर बढ़ती चिंता के जवाब में, शाहपुरा में व्याप्त व्यसन संबंधी समस्याओं से निपटने के उद्देश्य से एक व्यापक नशामुक्ति अभियान शुरू किया है। विभिन्न गैर सरकारी संगठनों और स्वास्थ्य सेवा संस्थानों के सहयोग से दिगराज सिंह शाहपुरा के  द्वारा शुरू किया गया यह अभियान जरूरतमंद लोगों को सहायता और पुनर्वास सेवाएं प्रदान करते हुए व्यसन के मूल कारणों को संबोधित करना चाहता है।

अच्छे व्यक्तित्व अच्छे समाज में ही जन्मते, पनपते और फलते-फूलते हैं। जिस समाज का वातावरण दूषित तत्त्वों से भरा होता है, उसकी अगली पीढ़ियां क्रमशः अधिक दुर्बल एवं पतित बनती चली जाती हैं। वातावरण भी निरंतर अधिक और अधिक बिगड़ता चला जाता है।

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बड़ी चुनौतियों को जन्म दे रहा नशा

शाहपुरा जैसे क्षेत्रों में मादक द्रव्यों के सेवन के कारण एक बड़ी चुनौती उत्पन्न हो रही है, इसलिए यह अभियान व्यसन के खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और मादक द्रव्यों के सेवन संबंधी विकारों के लिए मदद मांगने को कम करने पर केंद्रित है। शैक्षिक कार्यशालाओं, जन जागरूकता अभियानों और सामुदायिक आउटरीच कार्यक्रमों के माध्यम से, इस पहल का उद्देश्य व्यक्तियों और परिवारों को व्यसन के लक्षणों को पहचानने और आवश्यक सहायता और संसाधनों तक पहुंचने के लिए सशक्त बनाना है।

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शाहपुरा में लोग एक दूसरे की प्रगति उन्नति में सहायता के लिये तत्पर रहते हैं, दुःख-दर्द में साथ रहते हैं, सुख-संपत्ति को बांटकर रखते हैं और परस्पर स्नेह-सौजन्य का परिचय देते हुये स्वयं कष्ट सहकर दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हैं, उसे 'देव समाज' कहते हैं। ऐसे समाज के वातावरण को ही स्वर्गीय कहा जाता है। प्राचीन काल में भारत की सामाजिक परिस्थितियां उच्चस्तरीय थीं। दिव्य वातावरण था तो यहां घर घर में नर रत्न जन्मते थे और हर क्षेत्र में महापुरुषों का बाहुल्य दृष्टिगोचर होता था।

लगातार बढ़ रही हैं आपराधिक घटनाएं

पर गुलामी की लम्बी बीमारी के बाद और पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव में दुष्प्रवृत्तियों, दुर्व्यसनों का बोलबाला बढ़ा है। प्रायः लोग उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय और कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का विचार छोड़कर उपलब्ध सुविधा, सत्ता का अधिकाधिक प्रयोग स्वार्थ साधन में करने लगे हैं। पाप, दुराचार, अनीति एवं छल के साथ समाज में शोषण, उत्पीड़न, वैमनस्य, संघर्ष और अपराध की घटनायें बढ़ रही हैं। जिस समाज का वातावरण इतना विषाक्त हो,वहां की संतानें भी उच्छृंखल, अशिष्ट, अस्वस्थ, अर्धविक्षिप्त एवं अनैतिक मनोभूमि वाली ही पैदा होती हैं। वहां के वातावरण में दुष्प्रवृत्तियों और दुर्व्यसनों में निरंतर वृद्धि होती जाती है।

ऐसे समाज की प्रगति रुक जाती है और पतन की व्यापक परिस्थितियां उत्पन्न होने लगती हैं। चातुर्य, विज्ञान एवं श्रम के बल पर आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है पर उससे उपभोग के साधन मात्र बढ़ सकते हैं। मनुष्य की वास्तविक प्रगति एवं शांति तो पारस्परिक स्नेह-सौजन्य एवं सहयोग पर निर्भर करती है। यदि वह प्राप्त न हो सके, तो विपुल धनराशि और साधन सामग्री पाकर भी सुख-शांति के दर्शन दुर्लभ ही रहते हैं।

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प्रश्न उठता है कि इस बिगड़ी परिस्थिति को बदला कैसे जाये ? उत्तर बहुत सीधा है-भव्य समाज के अभिनव निर्माण का श्री गणेश अपने आप से ही शुरू किया जा सकता है और क्रमशः आगे बढ़ते हुए समाज सुधार तक पहुँचा जा सकता है। इसकी तीन सीढ़ियाँ हैं (1) आत्म निर्माण (2) परिवार निर्माण (3) समाज निर्माण। इसमें क्रमशः एक के बाद दूसरी पर चढ़ने के लिये अधिक योग्यता और समर्थता चाहिये।

प्रगति के हैं ये दो चरण

प्रगति के दो चरण हैं- दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन और सप्रवृत्तियों की संस्थापना। इसी प्रक्रिया को अध्यात्म में असुरता का उन्मूलन और देवत्व के परिपोषण की धर्मधारणा भी कहते हैं। दूसरे शब्दों में दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन को 'साधना' तथा सप्रवृत्ति संवर्धन को 'उपासना' का नाम दिया जाता है। स्वयं को बदलने या आत्मिक प्रगति की दिशा में इन्हीं दो कदमों को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाते हुये, साधक पारिवारिक और सामाजिक पर्यावरण में अभीष्ट परिवर्तन लाने में भी सफल होने लगता है।

इसके अलावा, अभियान युवाओं और हाशिए के समुदायों सहित कमजोर आबादी के बीच मादक द्रव्यों के सेवन के प्रसार को रोकने के लिए प्रारंभिक हस्तक्षेप और रोकथाम रणनीतियों के महत्व पर जोर देता है। स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक केंद्रों को शामिल करके, इस पहल का उद्देश्य व्यक्तियों को सूचित निर्णय लेने और मादक द्रव्यों के सेवन से संबंधित साथियों के दबाव का विरोध करने के लिए ज्ञान और कौशल से लैस करना है।

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दिगराज सिंह शाहपुरा का कहना है रोकथाम के प्रयासों के अलावा, नशा मुक्ति अभियान व्यसन से जूझ रहे लोगों के लिए उपचार और पुनर्वास सेवाओं तक पहुंच का विस्तार करने को प्राथमिकता देता है। इसमें प्रशिक्षित पेशेवरों द्वारा समर्पित हेल्पलाइन, परामर्श केंद्र और पुनर्वास सुविधाएं स्थापित करना शामिल है, जो मदद मांगने वाले प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत ज़रूरतों के अनुरूप सहायता, मार्गदर्शन और उपचार विकल्प प्रदान करते हैं।

नशा मुक्ति अभियान का उद्देश्य स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण बनाना

रोकथाम, हस्तक्षेप और सहायता सेवाओं को संयोजित करने वाले बहुआयामी दृष्टिकोण के माध्यम से,  शाहपुरा के नशा मुक्ति अभियान का उद्देश्य सभी निवासियों के लिए एक स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण बनाना है। सरकारी एजेंसियों, नागरिक समाज संगठनों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के बीच सहयोग को बढ़ावा देकर, यह पहल शहर में मादक द्रव्यों के सेवन और व्यसन से जुड़ी जटिल चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक ठोस प्रयास का प्रतिनिधित्व करती है।

यह भी पढ़ें… अस्पताल और स्कूल के बाद तिहाड़ जेल को बम से उड़ाने की धमकी

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(Note: इस भाषा कॉपी में हेडलाइन के अलावा कोई बदलाव नहीं किया गया है)

Published May 14th, 2024 at 16:25 IST

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