'धर्म चार पिलर्स पर खड़ा है, इसका मतलब सिर्फ रस्में, पूजा पाठ या खाने-पीने की आदतें नहीं हैं', बोले RSS चीफ मोहन भागवत
Mohan Bhagwat: महाराष्ट्र के यवतमाल में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती पर RSS प्रमुख मोहन भागवत ने ज़ोर देकर कहा कि देश की टिकाऊ तरक्की धर्म के चार जरूरी स्तंभों-सत्य, करुणा, तपस्या और पवित्रता पर आधारित होनी चाहिए।
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Mohan Bhagwat: मंगलवार, 29 सितंबर को RSS प्रमुख मोहन भागवत ने ज़ोर देकर कहा कि देश की टिकाऊ तरक्की धर्म के चार जरूरी स्तंभों-सत्य, करुणा, तपस्या और पवित्रता पर आधारित होनी चाहिए, जैसा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 'एकात्म मानव दर्शन' में बताया गया है।
महाराष्ट्र के यवतमाल में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए भागवत ने कहा कि असली सामाजिक कल्याण के लिए सिर्फ़ उपयोगितावादी पैमानों पर ध्यान देने के बजाय 'अंत्योदय' के जरिए सबसे कमजोर वर्गों के उत्थान की जरूरत है।
धर्म चार स्तंभों पर टिका है
भागवत ने बताया कि धर्म महज़ रीति-रिवाजों या व्यक्तिगत आदतों से कहीं ऊपर है। भागवत ने कहा, "हमारे प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि धर्म चार स्तंभों पर टिका है: पहला सत्य, दूसरा करुणा, तीसरा तपस्या और चौथा विचारों और कार्यों की पवित्रता, चाहे वह आंतरिक हो या बाहरी।"
किसी चीज को पाने से ज्यादा किसी के लिए छोड़ने में अधिक खुशी
भागवत ने जनसेवा के प्रति उपाध्याय के निस्वार्थ समर्पण को याद किया। उन्होंने कहा, "हमारा जीवन सिर्फ़ हमारे अपने लिए नहीं है। हमारा जीवन सबके लिए है। और अगर हम अपनी ज़िंदगी में कुछ चीज़ें छोड़ देते हैं या उनका त्याग करते हैं ताकि सबकी ज़िंदगी बेहतर हो सके, तो हमारा कुछ नुकसान नहीं होता। उन चीज़ों को पाने से जो खुशी मिलती, उससे कहीं ज़्यादा खुशी उन्हें दूसरों के लिए छोड़ने में मिलती है।"
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समाज का आखिरी व्यक्ति जितना खुश होगा, देश उतना ही खुशहाल
उन्होंने आगे कहा, "एक ज़ंजीर उतनी ही मजबूत होती है जितनी उसकी सबसे कमजोर कड़ी। अगर वह टूटती है, तो अपनी सबसे कमजोर कड़ी से ही टूटती है। वह कड़ी जितनी मजबूत होगी, पूरी ज़ंजीर उतनी ही मजबूत होगी। ठीक वैसे ही, समाज का आखिरी व्यक्ति जितना खुश होगा, देश उतना ही खुशहाल होगा। इसी को 'अंत्योदय' कहते हैं।"
विकास का मकसद सभी का उत्थान सुनिश्चित करना
भागवत ने आगे कहा, "विकास की आधुनिक परिभाषाओं में अक्सर 'ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का ज़्यादा से ज़्यादा भला' करने की बात कही जाती थी, लेकिन उन्होंने इसे नकार दिया और इसके बजाय सबके संपूर्ण कल्याण की वकालत की।
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विकास का मकसद सिर्फ़ किसी एक व्यक्ति या समूह का भला करना नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी का उत्थान सुनिश्चित करना चाहिए, चाहे वे इंसान हो, जानवर हो, पक्षी हो या प्रकृति हो और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना तरक्की करनी चाहिए।"