अपडेटेड 22 January 2025 at 09:12 IST
राष्ट्रवाद के लिए खतरे के तौर पर उभर रहा जनसांख्यिकीय बदलाव, उपराष्ट्रपति धनखड़ ने दी जानकारी
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने मंगलवार को कहा कि 'जनसांख्यिकीय बदलाव' राष्ट्रवाद के लिए गंभीर खतरा बन रहा है।
- भारत
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उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने मंगलवार को कहा कि 'जनसांख्यिकीय बदलाव' राष्ट्रवाद के लिए गंभीर खतरा बन रहा है। उन्होंने प्रलोभन के माध्यम से 'नैसर्गिक जनसांख्यिकी' को बदलने के प्रयासों के खिलाफ एकजुट प्रयास करने का आह्वान किया। शहर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय सभागार में 'बेहतर भारत बनाने के विचार' विषय पर छात्रों के साथ एक संवाद कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति ने अवैध प्रवासन की समस्या से निपटने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर, भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम)-रायपुर और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-भिलाई के छात्र मौजूद थे।
उन्होंने कहा…
उन्होंने कहा, ‘‘चिंता का एक गंभीर कारण है जिसका हमें एकजुट होकर समाधान करने की जरूरत है। जनसांख्यिकीय बदलाव के रूप में हमारे राष्ट्रवाद के लिए खतरे उभर रहे हैं। जनसांख्यिकीय बदलाव बहुत गंभीर है।’’ उपराष्ट्रपति ने कहा, ''नैसर्गिक जनसांख्यिकीय विकास सुखदायक, सामंजस्यपूर्ण है। लेकिन यदि जनसांख्यिकीय विस्फोट केवल लोकतंत्र को अस्थिर करने के लिए होता है तो यह चिंता का विषय है।''
उन्होंने कहा ‘‘ अपने लिए निर्णय लेना हर किसी का सर्वोच्च अधिकार है, लेकिन अगर वह निर्णय प्रलोभन द्वारा प्रेरित है और राष्ट्र की नैसर्गिक जनसांख्यिकी को बदलने की मंशा से है तो यह एक चिंता का विषय है जिस पर हम सभी को ध्यान देना चाहिए और इसका समाधान करना चाहिए।’’ उन्होंने घुसपैठ के मुद्दे को भी उठाया और देश में इसके प्रभाव को रेखांकित किया।
धनखड़ ने कहा, ‘‘हम करोड़ों की आबादी वाले इस देश में घुसपैठ का सामना कर रहे हैं। अगर हम संख्या गिनें तो... दिमाग चकरा जाता है। घुसपैठियों से निपटना होगा, लेकिन ऐसी स्थिति पैदा हुई है कि सांकेतिक प्रतिरोध भी नहीं होता। यह एक ऐसी समस्या है जिससे हमें निपटना होगा क्योंकि इसने अप्रबंधनीय आयाम को हासिल कर लिया है।’’
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धनखड़ ने कहा, ‘‘लाखों अवैध प्रवासी हमारे चुनावी तंत्र को अस्थिर करने की क्षमता रखते हैं, जहां लोग क्षुद्र राजनीतिक हित के बारे में सोचते हैं और उन्हें आसान समर्थक मिल जाते हैं। हमें हमेशा राष्ट्र को पहले रखना चाहिए और हमारे देश में एक अवैध प्रवासी का कोई औचित्य नहीं है।’’ उन्होंने कहा कि अगर यह लाखों में है, तो अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को देखें।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि वे (अवैध प्रवासी) हमारे संसाधनों, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों पर दबाव डालते हैं। लाखों की संख्या में अवैध प्रवासियों की इस विकराल समस्या के समाधान के लिए अब और इंतजार नहीं कर सकता।
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उन्होंने कहा, ‘‘हर गुजरते दिन के साथ हम समाधान का इंतजार करते हैं, मुद्दा और अधिक जटिल हो जाता है तथा इसका समाधान करने की जरूरत है।’’ उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्र की सेवा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि हर संस्था अपनी सुपरिभाषित भूमिका में काम करे।
उन्होंने कहा, ''चिंता का एक और क्षेत्र यह है कि एक फैशन बन गया है कि हर संस्थागत व्यक्ति दूसरे संस्थान को सलाह देगा कि वह अपने मामलों को कैसे संभाले। यह संविधान के काम करने की योजना नहीं है। संविधान ने हर संस्था के लिए एक भूमिका निर्धारित की है। विधायिका में बैठे लोग न्यायपालिका को यह सलाह नहीं दे सकते कि फैसले कैसे लिखे जाएं, यह न्यायपालिका की भूमिका है। इसी तरह, कोई भी संस्था विधायिका को दिन-रात यह सलाह नहीं दे सकती कि वह अपने मामलों का संचालन कैसे करे। संवैधानिक समझदारी यह है कि हम एक-दूसरे के क्षेत्र का सम्मान करें।''
उन्होंने कहा, ''इसलिए, राष्ट्र की सेवा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि प्रत्येक संस्था - विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका अपनी सुपरिभाषित भूमिकाओं में काम करें।''
समान नागरिक संहिता के संवैधानिक दायित्व का विरोध करने वालों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए धनखड़ ने कहा, ''आप में से जो लोग संवैधानिक प्रावधानों से अवगत हैं, यूसीसी नीति निर्देशक सिद्धांतों में है। शासन पर कानून बनाने, समान नागरिक संहिता बनाने का दायित्व डाला गया है। एक राज्य, उत्तराखंड ने यह किया है। आप उस चीज़ पर कैसे आपत्ति कर सकते हैं जो हमारे संविधान में लिखी गई है? जो राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है।''
उन्होंने कहा, ''संविधान के निर्माता बहुत बुद्धिमान थे, बहुत केंद्रित थे। उन्होंने हमें कुछ बुनियादी बातें दीं, लेकिन उन्होंने संकेत दिया कि जैसे-जैसे लोकतंत्र परिपक्व होता है, जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हमें अपने लोगों के लिए कुछ लक्ष्यों को भी महसूस करना चाहिए, उनमें से एक समान नागरिक संहिता है।''
सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने और सार्वजनिक व्यवस्था को चुनौती देने को लेकर उपराष्ट्रपति ने कहा, ''140 करोड़ की आबादी वाले इस देश में, जहां हमारे पास जिस तरह की सभ्यता है, वहां ऐसे लोग कैसे हो सकते हैं जो सार्वजनिक व्यवस्था को चुनौती देते हैं? जो लोग सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करते हैं? आपके राज्य में भी, वंदे-भारत पर हमला किया गया था। हम इस तरह के उपद्रवियों, इस तरह के तत्वों को कैसे अनदेखा कर सकते हैं और बर्दाश्त कर सकते हैं? इनसे बहुत सख्ती से और अनुकरणीय तरीके से निपटा जाना चाहिए।''
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने बातचीत के दौरान छात्रों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब भी दिया।
बातचीत के दौरान एक छात्र के सवाल का जवाब देते हुए धनखड़ ने कहा कि देश को गुणवत्ता वाले राजनेताओं की जरूरत है और इस देश के युवाओं को चिंतित होना चाहिए जब जनप्रतिनिधि अपना काम नहीं कर रहे हैं और संवाद तथा विचार-विमर्श के बजाय अशांति और व्यवधान में लगे हुए हैं। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे सोशल मीडिया और अन्य मंचों के माध्यम से जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाएं ताकि वे अपना कर्तव्य निभाएं। इस अवसर पर राज्यपाल रमेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी कार्यक्रम में मौजूद थे।
(Note: इस भाषा कॉपी में हेडलाइन के अलावा कोई बदलाव नहीं किया गया है)
Published By : Garima Garg
पब्लिश्ड 22 January 2025 at 09:12 IST