Umar Khalid: दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद को हाई कोर्ट से राहत, मिली 3 दिन की अंतरिम जमानत, लेकिन ये हैं शर्तें
उमर खालिद की मां की सर्जरी को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने हमदर्दी भरा नजरिया अपनाया है। कोर्ट ने उमर खालिद को तीन दिन की अंतरिम जमानत दे दी है। मगर कोर्ट ने इसके लिए कुछ शर्ते रखी है।
- भारत
- 3 min read

दिल्ली हाई कोर्ट से 2020 दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपी उमर खालिद को बड़ी राहत मिली है। शुक्रवार को कोर्ट ने उमर खालिद को तीन दिन की अंतरिम जमानत दे दी। हाई कोर्ट ने आरोपी की मां की सर्जरी को ध्यान में रखते हुए ये राहत दी है। न्यायमूर्ति की एकलपीठ ने उमर खालिद को 1 लाख रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दी है। कोर्ट ने जमानत देते हुए कई सख्त शर्तें भी लगाई हैं।
उमर खालिद की मां की सर्जरी को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने हमदर्दी भरा नजरिया अपनाया है। कोर्ट ने उमर खालिद को तीन दिन की अंतरिम जमानत दे दी है। हाई कोर्ट ने 1 जून को सुबह 7 बजे से 3 जून को शाम 5 बजे तक के लिए 1 लाख रुपये के निजी मुचलके पर आरोपी को जमानत दी।
उमर खालिद को किस आधार पर मिली जमानत
कोर्ट ने कहा कि खालिद को पहले भी पारिवारिक समारोहों के लिए अंतरिम जमानत दी गई थी और उन्होंने सभी शर्तों का पालन किया था। यह देखते हुए कि वह इस मामले में मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक हैं, कोर्ट ने उनकी मां की मेडिकल हालत को देखते हुए सीमित अंतरिम राहत दी।
जमानत के लिए कोर्ट की शर्ते
हालांकि, कोर्ट ने कुछ कड़ी शर्तें के साथ उमर खालिद को जमानत दी है। खालिद को निर्देश दिया गया है कि वह NCR के अंदर ही रहें, घर पर ही रहें और सिर्फ अस्पताल जाएं। अदालत ने खालिद को केवल अपनी मां की सर्जरी के लिए यह अस्थायी राहत प्रदान की है। जमानत की अवधि तीन दिन की है, जिसके बाद उन्हें वापस जेल लौटना होगा।
Advertisement
मां की सर्जरी के लिए राहत
खालिद ने अपने चाचा के चेहल्लुम में शामिल होने और अपनी बीमार मां की सर्जरी से पहले उनकी देखभाल करने के लिए अस्थायी जमानत मांगी थी। अतिरिक्त सेशन जज समीर वाजपेयी ने इस हफ्ते की शुरुआत में यह याचिका खारिज कर दी थी।जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की एक बेंच ने हाल उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने वाले पिछले फैसलों पर चिंता जताई थी।
बेंच ने जोर देकर कहा कि UAPA के तहत भी जमानत नियम है और जेल अपवाद है। अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले संवैधानिक अधिकारों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।