अपडेटेड 13 September 2024 at 21:07 IST

1971 युद्ध के वीर सपूत की ये कैसी अंतिम यात्रा? पार्थिव शरीर को नदी पार कराने के लिए ट्रॉली का सहारा

Haldwani News: 1971 युद्ध के वीर सपूत के पार्थिव शरीर को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए ट्रॉली का सहारा लेना पड़ा। नदी पार कराने के लिए गांव में कोई पुल नहीं है।

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Uttarakhand News: अपने भाषणों में नेता विकास को लेकर भले कितने ही बड़े-बड़े वादे करें, लेकिन सच ये है कि हमारे देश में आज भी कई ऐसे ग्रामीण इलाके हैं। जहां अभी तक मूलभूत सुविधाएं भी नहीं पहुंच पाई हैं। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में तो ऐसे गांवों की भरमार है। हल्द्वानी में रानीबाग के दानीजाला गांव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यहां भारत-पाकिस्तान के 1971 युद्ध के वीर सपूत गोपाल ने दम तोड़ा तो एक सम्मानजनक अंतिम यात्रा भी नसीब नहीं हुई।

वीर सपूत गोपाल के पार्थिव शरीर को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए नदी पार कराने के ट्रॉली का सहारा लेना पड़ा। दानीजाला गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव एक पुरानी समस्या है। इस गांव के जिस बेटे ने देश की सेवा के लिए अपनी पूरी जवानी लगा दी। उसके गांव में सरकार और प्रशासन एक स्थाई पुल तो क्या एक साधारण झूला पुल भी मुहैया नहीं करा पाए। गोपाल ने देश के लिए 1971 के युद्ध में अपना सहयोग दिया था, उस वीर की अंतिम यात्रा भी मानो एक 'युद्ध' लड़ने के बराबर रही।

नदी पार है श्मशान घाट

गोपाल के गांव दानीजाला में श्मशान घाट जाने के लिए गौला नदी को पार करना पड़ता है। लेकिन गौला नदी को पार करने के लिए कोई पुल नहीं है। गोपाल के शव को जब अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट ले जाने के लिए चुनौती खड़ी हो गई। स्थानीय ग्रामीणों ने पार्थिव शरीर को ट्रॉली की मदद से उफानाई गौला नदी को पार कराया, तब जाकर वीर सपूत को चार कंधे नसीब हुए।

दशकों पुरानी झूला पुल की मांग

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में दुश्मन के छक्के छुड़ाते हुए गोपाल ने एक बार भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें मूलभूत सुविधाओं का अभाव मरने के बाद भी झेलना होगा। गोपाल लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके दो बेटे सेना में देश की सेवा कर रहे हैं। गांव में झूला पुल की मांग दशकों पुरानी है। इस गांव के लोग ब्रिटिश आर्मी से लेकर भारतीय सेना तक देश की सेवा करते आ रहे हैं। वर्तमान में भी गांव के दर्जनों युवा आर्मी में भर्ती हैं। इसके बाद भी एक अदद झूला पुल की मांग पूरी नहीं हो पार ही है। हैरान करने वाले बात ये है कि ये कोई रिमोट इलाका नहीं है, बल्कि हल्द्वानी शहर से लगा हुआ है। 

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Published By : Sagar Singh

पब्लिश्ड 13 September 2024 at 21:07 IST