जाति जनगणना: BJP नेता तरुण चुघ बोले- 'अब श्रेय वो ले रहे जिनकी चार पीढ़ियों ने वंचितों के अधिकारों का विरोध किया'

दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने जाति जनगणना को राष्ट्रीय जनगणना में शामिल किए जाने को ऐतिहासिक कदम बताया।

  • Facebook Share Icon
  • Twitter Share Icon
  • WhatsApp Share Icon
 
Follow : Google News Icon
Tarun Chugh
तरुण चुघ | Image: PTI

दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने जाति जनगणना को राष्ट्रीय जनगणना में शामिल किए जाने को ऐतिहासिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के सपनों को साकार करने के उद्देश्य से लिया है। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि अब वे लोग श्रेय लेने की होड़ में हैं जिन्होंने दशकों तक वंचितों के अधिकारों का विरोध किया। राहुल गांधी को संबोधित करते हुए चुघ ने 1990 में संसद में राजीव गांधी के भाषण की याद दिलाई और कहा कि जनता कांग्रेस का असली चेहरा जानती है। 

दरअसल, केंद्र की मोदी सरकार ने जाति जनगणना करवाने का फैसला किया है। लंबे समय से यह मांग चल रही थी, अब जाकर केंद्र ने इसे हरी झंडी दिखाई है। अब जाति जनगणना के एक ऐलान ने पूरे देश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। बड़ी बात यह है कि विपक्ष इसे अपनी जीत के रूप में देख रहा है। उसका तर्क है कि कांग्रेस और दूसरी समाजवादी पार्टियां लंबे समय ऐसे केंद्र पर दबाव बना रही थीं, तब जाकर जाति जगनणना का ऐलान किया गया। अब यहां पर सवाल उठता है कि जाति जनगणना का मतलब क्या है, इसकी आखिर क्यों जरूरत पड़ी है?

जातिगत जनगणना का मतलब क्या है?

जातिगत जनगणना का सीधा मतलब होता है कि देश में किसी जाति के कितने लोग हैं, इसके स्पष्ट आंकड़े सामने रखे जाएं। अब देश में जातिगत जनगणना पहले भी हुई है, लेकिन तब ओबीसी को उसमें शामिल नहीं किया जाता था। ऐसे में बात जब भी जातिगत जनगणना की होती है, सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रहती है कि देश में ओबीसी वर्ग अब कितना ज्यादा बड़ा बन चुक है, आखिर इस समाज के कितने लोग देश में रह रहे हैं? इस बार भी जो जातिगत जनगणना करवाई जाएगी, सभी की नजर सिर्फ इस बात पर रहेगी कि ओबीसी कितने प्रतिशत हैं।

जातिगत जनगणना का इतिहास क्या है?

जातिगत जनगणा की शुरुआत अंग्रेजों के समय से हो गई थी। सबसे पहले साल 1931 में जाति जनगणना करवाई गई थी। अंग्रेजों के दौर में तो वैसे भी हिंदुस्तान के लोगों को जाति के आधार पर ही देखा जाता था, ऐसे में तब ऐसी किसी भी जनगणना को होना काफी आम बात थी। वैसे एक बात तो तब भी तय कर दी गई थी, हर 10 साल में जातिगत जनगणना करवाई जाएगी। ऐसे में 1941 में भी इस प्रक्रिया को किया गया, लेकिन तब आंकड़े सामने नहीं रखे गए। तर्क दिया गया कि जाति आधारित टेबल तैयार नहीं हो पाई, ऐसे में आंकड़े भी जारी नहीं हुए।

Advertisement

फिर देश आजाद हुआ और 1951 में फिर जाति जनगणना करवाई गई। यहां पर पहली बार बड़ा खेल हुआ, इतने बड़े सर्वे में ओबीसी वर्ग को शामिल नहीं किया गया। सिर्फ अुसूचित और अनुसूचित जनजातियों को जनगणना में रखा गया। 2011 तक ऐसे ही चलता रहा, जनगणना तो हुई लेकिन ओबीसी वर्ग को लेकर ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई।

जातिगत जनगणना की अब क्यों जरूरत?

असल में देश में जब मंडल कमीशन लागू हुआ था, तब कहा गया था कि देश में ओबीसी वर्ग की आबादी 52 फीसदी है। लेकिन तब वीपी सरकार जिस 52 फीसदी के आंकड़े तक पहुंची थी, उसका आधार 1931 का सेंसस था। ऐसे में उसे कितना सटीक माना जाए, यही सबसे बड़ा सवाल रहा। तर्क दिया गया कि देश में समय के साथ ओबीसी की आबादी भी बदल चुकी है, काफी ज्यादा बढ़ी भी है, ऐसे में 52 फीसदी का आंकड़ा कितना सही माना जाए? अब यह सवाल उन पार्टियों द्वारा सबसे ज्यादा उठाया गया जो चाहते थे कि जातिगत जनगणना करवाई जाए।

Advertisement

वैसे सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में साफ कर दिया था कि सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती हैय़ अब यही पर जाति जनगणना की बात करना जरूरी है। इसका विरोध करने वाले मानते हैं कि अगर ओबीसी की आबादी ज्यादा निकली तो 50 फीसदी की सीमा को भी तोड़ दिया जाएगा। कुछ का तर्क तो यह भी है कि ऐसे किसी भी सेंसस से देश में और ज्यादा बंटवारा हो जाएगा।

यह भी पढ़ें : सरहद पर ताकती रहीं माताओं की निगाहें, पाकिस्तान ने नहीं खोला बॉर्डर

Published By:
 Nidhi Mudgill
पब्लिश्ड