Allahabad HC: पत्नी अगर ज्यादा पढ़ी-लिखी और सक्षम हो तो गुजारा भत्ता दिया जा सकता है या नहीं? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा

Allahabad HC News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम सुनवाई की है, जिसमें याचिका थी कि, 'पत्नी अगर ज्यादा पढ़ी-लिखी है तो क्या गुजारा भत्ता देने से पति मना कर सकता है?' जानिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर क्या कहा है?

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Allahabad High Court Denies Bail To Man For Posts Against PM Modi, Armed Forces
इलाहाबाद हाईकोर्ट | Image: ANI

Allahabad HighCourt News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है, जिसमें साफ तौर से कहा गया है कि, पत्नी को सिर्फ इस आधार पर गुजारा भत्ता देने से मना नहीं किया जा सकता कि वो ज्यादा पढ़ी-लिखी है। हाईकोर्ट ने कहा कि हाई एजुकेशन और योग्य होना ये नहीं दिखाता कि पत्नी खुद कमाई कर सकती है।

दरअसल, बुलंदशहर से सुमन वर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गरिमा ने कहा कि, पति अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी से सिर्फ इसलिए नहीं बच सकता कि पत्नी में कमाई की योग्यता है।' इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- 'कई स्थिति महिलाओं की वास्तविकता को दिखाती है, जो पढ़ाई-लिखाई के बाद भी सालों तक घरेलू काम और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारियों के बाद नौकरी पर लौटने में कठिनाई महसूस करती है।'

हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका खारिज करने पर फटकारा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ तौर पर बुलंदशहर के अपर प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय का आदेश रद्द कर दिया है। जिसमें पति से गुजारा भत्ता मांगने के लिए पत्नी की याचिका CRPC की धारा 125 के तहत खारिज कर दी गई थी।

पति का दावा था कि पत्नी बहुत पढ़ी-लिखी है

पीड़ित महिला के वकील ने कहा कि महिला के पास आय का कोई जरिया नहीं है। महिला के पति यह साबित करने में असफल रहे कि उनकी पत्नी काम कर रही थी और पैसे कमा रही थी। साथ ही, पति का दावा था कि पत्नी बहुत पढ़ी-लिखी है, फिलहाल प्राइवेट टीचर के रूप में काम कर रही है, उसके पास टेलरिंग में ITI डिप्लोमा है और वह बच्चों को ट्यूशन देकर भी पैसे कमाती है। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि, 'पत्नी का पति से गुजारा भत्ता पाने का कानूनी अधिकार इस आधार पर समाप्त नहीं होता कि वह कमाई करने की क्षमता रखती है।'

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परिवार न्यायालय का आदेश इलाहाबाद HC ने किया रद्द 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिलाओं को लेकर कहा कि ये एक सामाजिक सच्चाई है कि महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों में लग जाती हैं और बच्चों की परवरिश करती हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने पीड़िता के बेटे को दिए गए भत्ते को भी कम बताया। हाईकोर्ट का ध्यान एक और बात पर गया कि, याचिका के किशोर बेटे के लिए  परिवार न्यायालय के माध्यम से दिया गया 3000 रुपये का भत्ता बहुत ही कम है। क्योंकि लड़के को उसकी पढ़ाई और स्वस्थ माहौल में बड़ा होने के लिए सहारे की जरूरत है।

इसी के साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को रद्द किया और कड़ा आदेश दिया कि एक महीने में सिरे से तर्कसंगत आदेश पारित किया जाए। जिससे पीड़ित महिला और उसके किशोरी बेचे को न्याय मिले।  

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Published By:
 Sujeet Kumar
पब्लिश्ड