
कयामत के बाद भी जिंदा रहेंगे कॉकरोच, 30 करोड़ से भी अधिक साल से धरती पर मौजूद; किस देश से निकलकर दुनिया में फैले?
Coackroach: कॉकरोच... ये शब्द पिछले कुछ दिनों से खूब चर्चा में है। आलम ऐसा है कि ये शब्द डिजिटल मीडिया का ट्रेंडिग कीवर्ड बन चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये दुनिया में कब से मौजूद हैं? इनकी कहानी कितने करोड़ सालों पुरानी है? या फिर कहां से निकलकर चारों तरफ फैले? अगर नहीं तो चलिए बताते हैं...
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सोशल मीडिया पर इन दिनों 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) छाई हुई है। भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से किए जाने के बाद इसी नाम पर पार्टी लॉन्च कर दी गई।
अभिजीत दीपके नाम के शख्स ने 16 मई को मजाकिया पार्टी 'कॉकरोच जनता पार्टी' की शुरुआत की। लेकिन देखते ही देखते ये पार्टी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। महज कुछ ही दिनों में करोड़ों लोग इससे जुड़ गए।
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इसी कारण अचानक 'कॉकरोच' चर्चा के केंद्र में आ गया। इंस्टाग्राम से लेकर एक्स (पूर्व में ट्विटर) तक सिर्फ कॉकरोच की ही चर्चा है।
इस बीच हम असली कॉकरोच के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने डायनासोर के दौर से लेकर परमाणु हमलों की दहशत तक झेली। इसके बावजूद ये 4000 हजार से ज्यादा प्रजातियों के साथ अब भी धरती पर मौजूद है।
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अक्सर घर के कोनों, दीवारों और फ्रीज के पीछे नजर आने वाले कॉकरोचों को लेकर कहा जाता है कि ये कॉकरोच तब भी धरती पर जीवित रहेंगे जब सभी जीव-जंतुओं के नामोनिशान मिट जाएंगे।
कॉकरोच डायनासोर से भी पुराने माने जाते हैं। यूरोप और उत्तरी अमेरिका से मिले जीवाश्म इसकी गवाही देते हैं। करीब 6.6 करोड़ साल पहले जब धरती पर उल्कापिंड गिरे तो डायनासोर खत्म हो गए, लेकिन कॉकरोच बच गए।
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कॉकरोच धरती 30 करोड़ से भी ज्यादा साल से घूम रहे हैं। ये भी कहा जाता है कि ये परमाणु जंग में भी जिंदा रह सकते हैं। फिलहाल दिखाई देने वाले कॉकरोच जर्मन कॉकरोच कहलाते हैं।
जीनोमिक स्टडी के मुताबिक, जर्मन कॉकरोच करीब 2100 साल पहले भारत और म्यामांर के बस्तियों में पाए जाते थे। कुछ एशियाई कॉकरोचों ने भारत से म्यांमार तक की इंसानी बस्तियों के अनुकूल खुद को ढाल लिया था।
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कॉकरोच की कई प्रजातियां है, लेकिन मुख्य रूप से चार सबसे ज्यादा चर्चित हैं। चार प्रकार के कॉकरोचों में जर्मन कॉकरोच, अमेरिकन कॉकरोच ओरिएंटल कॉकरोच और एशियन कॉकरोच आते हैं।
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एशियन कॉकरोच को जर्मन कॉकरोच का ही रिश्तेदार माना जाता है। इनमें कई तरह की समानताएं भी होती हैं।
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एक स्टडी के मुताबिक, जर्मन कॉकरोच असल में एशियाई कॉकरोच से विकसित हुआ है। ये पूर्वी भारत, म्यांमार और आसपास के बंगाल की खाड़ी के क्षेत्रों की मूल निवासी बताई गई है।
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कॉकरोच नाम का नाता स्पेनिश शब्द 'कुकराचा' से है। 16वीं सदी में इस जीव से अंग्रेज व्यापारियों का सामना होने के बाद उन्होंने कॉकरोच नाम रख दिया। हालांकि भारत में इसे तिलचट्टा भी कहा जाता है।
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कॉकरोच को तिलचट्टा इसलिए कहा जाता है क्योंकि पुराने जमाने में रात के समय में घरों में तेल और घी के दिये जलाए जाते थे। इन्हीं को चाटने के लिए कॉकरोच आ जाते हैं। इसी कारण इनका नाम चिलचट्टा पड़ गया।
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कॉकरोच अक्सर अंधियारे में पाए जाते हैं। उनकी अधिकतर कोशिश ऐसी जगहों पर छिपने की रहती है। इसी फितरत के चलते वे दुनियाभर में फैल गए।