कौन थे जसवंत सिंह खालरा? जिनके गायब होने से हिल गया था पूरा पंजाब, अब 'सतलुज' में दिखाई गई उनकी असल जिंदगी की कहानी तो हुआ बवाल

Diljit Dosanjh Movie Satluj: यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमा नहीं है, बल्कि पंजाब के इतिहास के उस काले पन्ने को सामने लाने की कोशिश है, जिसे दबाने के लिए जसवंत सिंह खालरा को अपनी जान गंवानी पड़ी।

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Diljit Dosanjh Film Satluj | Image: Instagram

Diljit Dosanjh Movie Satluj: इन दिनों एक्टर और सिंगर दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। वजह सिर्फ फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि इसके साथ हुआ एक बड़ा विवाद है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने के महज 48 घंटे के भीतर इस फिल्म को अचानक हटा दिया गया।

दरअसल, इस फिल्म को साल 2022 में 'पंजाब 95' नाम से सेंसर बोर्ड (CBFC) के पास भेजा गया था। तीन साल तक लटके रहने के बाद फरवरी 2025 में बोर्ड ने इसमें 127 कट्स (बदलाव) लगाने को कहा। इतने कट्स के साथ फिल्म का वजूद ही खत्म हो जाता, इसलिए मेकर्स ने इसे थिएटर के बजाय सीधे ओटीटी पर 'डायरेक्टर्स कट' के रूप में रिलीज कर दिया।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिलजीत दोसांझ की यह फिल्म किस पर बनी है? तो चलिए जानते हैं उस निडर इंसान जसवंत सिंह खालरा की कहानी, जिन्होंने 90 के दशक में पूरे पंजाब की सियासत और पुलिस प्रशासन को हिलाकर रख दिया था।

कौन थे जसवंत सिंह खालरा?

जसवंत सिंह खालरा पंजाब के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे। 1980 और 1990 के दशक में जब पंजाब उग्रवाद के दौर से गुजर रहा था, तब खालरा ने एक ऐसा सच दुनिया के सामने रखा जिसने सबको झकझोर दिया।

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उन्होंने सबूतों और गवाहों के साथ यह दावा किया कि पंजाब पुलिस ने उग्रवाद को खत्म करने के नाम पर हजारों बेकसूर लोगों को अवैध रूप से उठाया  और बिना उनके परिवारों को बताए, चुपचाप उनका अंतिम संस्कार कर दिया। उनके इस खुलासे ने देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा गरमा दिया।

खालरा किस 'सच्चाई' की तलाश में थे?

पंजाब में ऑपरेशन ब्लू स्टार, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के सिख दंगों के बाद हालात बेहद तनावपूर्ण थे। इस दौर में जसवंत सिंह खालरा मुख्य रूप से चार बड़े मामलों की तह तक जाना चाहते थे।

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  • बेहला पुलिस कस्टडी मर्डर: पुलिस हिरासत में हुई हत्या का मामला।
  • ह्यूमन-शील्ड केस: जिसमें छह निर्दोष ग्रामीणों की मौत हो गई थी।
  • 25,000 अज्ञात शवों का सच: पंजाब के श्मशान घाटों में हजारों लावारिस बताकर जलाए गए शवों की हकीकत।
  • 2,000 पुलिसकर्मियों की हत्या उन पुलिस अफसरों की हत्या का मामला, जिन्होंने कथित तौर पर पुलिस के गलत एनकाउंटरों और अभियानों में साथ देने से मना कर दिया था।

"क्या कोई इंसान अपनी ही कार धोते-धोते अचानक गायब हो सकता है?" – यही वो सवाल था जिसने पंजाब पुलिस को कटघरे में खड़ा किया।

कैसे गायब हुए जसवंत सिंह खालरा?

जब खालरा के दावों ने दुनिया भर का ध्यान खींचा, तो वो उन ताकतों की आंखों की किरकिरी बन गए जो इस सच को दबाना चाहती थीं। सितंबर 1995 में, अमृतसर में उनके घर के बाहर से खालरा अचानक लापता हो गए। चश्मदीदों के मुताबिक, वह अपने घर के बाहर कार धो रहे थे, तभी पंजाब पुलिस के कुछ लोग आए और उन्हें उठाकर ले गए। इसके बाद वो कभी वापस नहीं लौटे। बाद में पता चला कि पुलिस हिरासत में ही उनकी हत्या कर दी गई थी।

इंसाफ की लंबी लड़ाई

खालरा के गायब होने के बाद उनकी पत्नी, परमजीत कौर खालरा ने हार नहीं मानी। उन्होंने नेताओं से लेकर अदालतों तक का दरवाजा खटखटाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच सीबीआई (CBI) को सौंपी गई।

1996 में सीबीआई को सबूत मिले कि खालरा को तरनतारन के एक थाने में अवैध रूप से रखा गया था। एजेंसी ने 9 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपहरण और हत्या का केस दर्ज करने की सिफारिश की। 2007 यानी 12 साल बाद लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 16 अक्टूबर 2007 को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस मामले में शामिल चार पूर्व पुलिस अधिकारियों (सतनाम सिंह, सुरिंदर पाल सिंह, जसबीर सिंह और प्रीतपाल सिंह) को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।

फिल्म 'सतलुज' के बारे में

हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी इस फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा का मुख्य किरदार निभाया है। उनके साथ अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की, गीतिका विद्या ओहल्यान और कंवलजीत सिंह जैसे कलाकारों ने अहम भूमिकाएं निभाई हैं। फिल्म को रॉनी स्क्रूवाला (RSVP) और मैकगफिन पिक्चर्स ने मिलकर प्रोड्यूस किया है।

दिलचस्प बात यह है कि विवादों के चलते इस फिल्म का नाम तीन बार बदला गया। पहले इसका नाम 'घल्लूघारा' रखा गया था, जिसे बदलकर सेंसर बोर्ड के वक्त 'पंजाब 95' किया गया, और आखिरकार इसे 'सतलुज' नाम से रिलीज किया गया। यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमा नहीं है, बल्कि पंजाब के इतिहास के उस काले पन्ने को सामने लाने की कोशिश है, जिसे दबाने के लिए जसवंत सिंह खालरा को अपनी जान गंवानी पड़ी।

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Published By:
 Samridhi Breja
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