जाति या लोकप्रियता... सितारों-क्रिकेटर्स को प्रत्याशी बनाने के पीछे क्या होता है पार्टियों का मकसद?

प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर राजेश मिश्र कहते हैं कि राजनीतिक दल संकट के दौरान या फिर अपनी सीट बढ़ाने के लिए सिनेमा जगत के कलाकारों का सहारा लेते हैं।

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Celebs in Politics
चुनाव में फिल्मी सितारों को मौका क्यों? | Image: Instagram

Celebrities in Politics: भोजपुरी गायक एवं अभिनेता पवन सिंह के पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने से मना करने के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर राजनीतिक दल सिनेमा जगत के कलाकारों को उम्मीदवार क्यों बनाते हैं। प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर राजेश मिश्र का दावा है कि राजनीतिक दल संकट के दौरान या फिर अपनी सीट बढ़ाने के लिए सिनेमा जगत के कलाकारों का सहारा लेते हैं।

आगामी लोकसभा चुनाव के लिए उत्‍तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अभी तक चार मौजूदा सांसदों हेमा मालिनी (मथुरा), पूर्व टीवी अभिनेत्री स्मृति ईरानी (अमेठी), अभिनेता रवि किशन (गोरखपुर) और दिनेश लाल यादव निरहुआ (आजमगढ़) को फिर से उम्मीदवार बनाया है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने हास्य धारावाहिक 'लापतागंज' की अभिनेत्री काजल निषाद को गोरखपुर से अपना उम्मीदवार घोषित किया है।

क्या कहते हैं प्रोफेसर राजेश मिश्रा?

लखनऊ विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉक्टर राजेश मिश्रा ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा, ‘‘चुनावी रणनीति में लोकप्रियता का बहुत महत्व है, लेकिन जो भी राजनीतिक दल इनको (फिल्म जगत के कलाकारों को) मौका देते हैं, उन दलों में आत्‍मविश्‍वास की कमी जरूर होती है।'' डॉक्टर मिश्रा ने कहा कि राजनीतिक दल संकट में या फिर अपनी सीट बढ़ाने के लिए ऐसे लोकप्रिय चेहरों का सहारा लेते हैं और यह बहुत पुरानी परिपाटी है।

प्रोफेसर राजेश मिश्रा ने जोर देकर कहा, ‘‘उनका (अभिनेता-अभिनेत्रियों का) कोई राजनीतिक मूल्य नहीं है, लेकिन उनकी उम्मीदवारी से आसपास की सीट पर भी प्रशंसकों का झुकाव उनसे संबंधित दल की ओर होता है और उनको मौका मिलने की एक बड़ी वजह यह भी होती है।''

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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने इलाहाबाद संसदीय सीट पर देश के दिग्गज नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ सिने अभिनेता अमिताभ बच्‍चन को उतारा था और वह जीत गए। उस चुनाव में बच्‍चन को दो लाख 97 हजार से ज्‍यादा मत मिले जबकि बहुगुणा को एक लाख 10 हजार से भी कम मतों से संतोष करना पड़ा था।

जाति और क्षेत्रीय समीकरण का भी होता है असर

वहीं, एक अन्य राजनीतिक टिप्पणीकार ने अभिनेताओं की जाति और क्षेत्रीय समीकरण का जिक्र करते हुए दावा किया कि मथुरा में हेमा मालिनी को उनके ‘ग्लैमर’ के साथ उनके पति धर्मेंद्र की जाति (जाट) के मतदाताओं की अच्छी संख्या के नाते भाजपा ने मौका दिया। उन्होंने कहा कि गोरखपुर में भाजपा ने रवि किशन शुक्ला को ब्राह्मण बिरादरी के साधने के लिए उम्मीदवार बनाया है। इसी तरह सपा ने काजल निषाद को मल्लाह, माझी और केवट बिरादरी को साधने के लिए उम्मीदवार बनाया। भाजपा ने आजमगढ़ लोकसभा सीट से दिनेश लाल यादव को इसलिए मौका दिया कि वहां यादव बिरादरी के मतदाताओं की संख्या काफी है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में भोजपुरी भाषी लोगों और बिहार के लोगों की अच्छी तादाद की वजह से मनोज तिवारी फिर से टिकट पाने में कामयाब रहे हैं।

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‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ एंड ‘नेशनल इलेक्शन वॉच’ की उत्तर प्रदेश इकाई के मुख्य समन्वयक संजय सिंह ने कहा, ''मुझे लगता है कि कलाकार को जाति के साथ नहीं जोड़ना चाहिए। कलाकार जाति से ऊपर होते हैं और अगर राजनीतिक दल कलाकारों की कला को भूलकर उनकी जाति का उपयोग करते हैं तो यह सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं है।''

जब नहीं चल पाया नेताओं के आगे सितारों का जादू

फिल्म और राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले मऊ निवासी राम बचन यादव ने कहा, ''राजनीतिक दल भले मायानगरी का ‘ग्लैमर’ भुनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कई बार यह भी देखा गया है कि दिग्गज नेताओं के सामने कलाकारों और उनकी जाति का जादू नहीं चल पाया है।'' उन्‍होंने कहा, “समाजवादी पार्टी ने 1996 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सामने लखनऊ में अभिनेता राज बब्बर को उतारा और उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ 2009 में गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र में अभिनेता-गायक मनोज तिवारी को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन ये दोनों कलाकार कोई करिश्मा नहीं कर सके।” हालांकि, 2014 और 2019 में मनोज तिवारी दिल्ली में भाजपा से जीत गए और तीसरी बार पार्टी के फिर से उम्मीदवार हैं। राज बब्बर भी बाद में 1999 और 2004 में आगरा में सपा से और 2009 में कांग्रेस के टिकट पर फिरोजाबाद से चुनाव जीते।

ऐसे और भी कई उदाहरण हैं। वर्ष 2014 में अमेठी में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के मुकाबले स्मृति ईरानी को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया, हालांकि गांधी ने ईरानी को पराजित कर दिया। लेकिन वर्ष 2019 में ईरानी ने गांधी को चुनाव में हराकर कांग्रेस के अमेठी किले पर कब्जा जमा लिया।

लखनऊ में 2019 के चुनाव में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ सपा ने शत्रुघ्‍न सिन्‍हा की पत्नी व पूर्व अभिनेत्री पूनम सिन्‍हा को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन पूनम सिन्‍हा तीन लाख 44 हजार से भी अधिक मतों के अंतर से पराजित हो गयीं। इसके पहले 2014 में सिंह के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने अदाकार जावेद जाफरी को प्रत्याशी बनाकर यही प्रयोग किया था, लेकिन जाफरी चुनाव परिणाम में पांचवें स्थान पर थे। वर्ष 2009 में लखनऊ में भाजपा नेता लालजी टंडन के खिलाफ सपा ने अभिनेत्री नफीसा अली को मौका दिया, लेकिन टंडन के मुकाबले वह चौथे स्थान पर रहीं।

आजमगढ़ में 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रमुख व पूर्व मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के सामने भाजपा उम्मीदवार व भोजपुरी कलाकार दिनेश लाल यादव निरहुआ पराजित हो गए, लेकिन अखिलेश यादव के त्यागपत्र के बाद हुए उपचुनाव में निरहुआ ने अखिलेश के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को पराजित कर दिया। प्रदेश के रामपुर संसदीय क्षेत्र से अभिनेत्री जयाप्रदा दो बार विजयी रहीं, लेकिन उन्‍हें आजम खान के मुकाबले पराजय का सामना करना पड़ा। इसके पहले 2004 और 2009 में वह रामपुर से सपा के चुनाव चिह्न पर संसद सदस्य निर्वाचित हुई थीं।

उप्र प्रधानाचार्य परिषद के प्रदेश महामंत्री डॉक्टर रवीन्द्र त्रिपाठी ने कहा, ‘‘अगर कलाकार में सार्वजनिक जीवन के प्रति संवेदना और समर्पण नहीं है और उनको दायित्व देने की बात सोची जाती है, या उनको स्थापित करके सीट बढ़ाने का लक्ष्य बनाया जाता है तो यह गलत है।’’

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(Note: इस भाषा कॉपी में हेडलाइन के अलावा कोई बदलाव नहीं किया गया है)

Published By:
 Ruchi Mehra
पब्लिश्ड