Yogini Ekadashi 2026 Vrat Katha: आज जरूर पढ़ें योगिनी एकादशी की कथा, मिलेगा 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य
Yogini Ekadashi 2026 Vrat Katha: हिंदू पंचांग के हिसाब से आज योगिनी एकादशी है और इस दिन व्रत कथा पढ़ने का विशेष विधान है। आइए जानते हैं।
- धर्म और अध्यात्म
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सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'योगिनी एकादशी' कहा जाता है। पद्मपुराण के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, जीवन में सुख-समृद्धि आती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य फल मिलता है। आइए जानते हैं इसकी पौराणिक कथा।
भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का संवाद
महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत की महिमा बताई थी। श्रीकृष्ण ने कहा कि योगिनी एकादशी संसार सागर में डूबे प्राणियों के लिए एक मजबूत नौका के समान है, जो बड़े से बड़े पापों का भी नाश कर देती है।
कुबेर का शाप और हेममाली यक्ष की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, अलकापुरी नगरी के राजा कुबेर परम शिव भक्त थे। उनके यहां हेममाली नाम का एक यक्ष सेवक था, जिसका काम रोज मानसरोवर से भगवान शिव की पूजा के लिए ताजे फूल लाना था। हेममाली अपनी अत्यंत सुंदर पत्नी विशालाक्षी के प्रेम में पूरी तरह आसक्त था।
एक दिन वह मानसरोवर से फूल तो ले आया, लेकिन कुबेर के महल जाने के बजाय अपनी पत्नी के पास घर रुक गया। उधर दोपहर तक कुबेर शिव पूजा के लिए फूलों का इंतजार करते रहे। जब पूजा का समय निकल गया, तो क्रोधित कुबेर ने अपने सेवकों को सच पता लगाने भेजा। सेवकों ने आकर बताया कि हेममाली अपनी पत्नी के साथ कामासक्त होकर घर पर ही रुका हुआ है।
यह सुनकर कुबेर अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत हेममाली को दरबार में बुलवाया। कुबेर ने उसे डांटते हुए शाप दिया, "तूने भगवान की अवहेलना की है, इसलिए तू इसी क्षण कोढ़ी हो जा और अपनी पत्नी के वियोग में इस राज्य से निष्कासित होकर दूर चला जा।"
मुनि मार्कण्डेय का मार्गदर्शन और शाप से मुक्ति
शाप के प्रभाव से हेममाली तुरंत धरती पर गिर गया और कोढ़ से पीड़ित हो गया। वह दुखी होकर जंगलों और पहाड़ों में भटकने लगा, लेकिन शिव पूजा के प्रभाव से उसकी याददाश्त बनी रही। भटकते हुए वह मेरुगिरि पर्वत पर पहुंचे, जहाँ महान तपस्वी मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम था। हेममाली ने मुनि के चरणों में गिरकर प्रणाम किया।
यक्ष की दयनीय स्थिति देखकर मार्कण्डेय ऋषि ने उससे इसका कारण पूछा। हेममाली ने सच बताते हुए अपनी भूल स्वीकार की और मुक्ति का उपाय मांगा। ऋषि ने उस पर दया करते हुए कहा, तुमने सत्य बोला है, इसलिए मैं तुम्हें कल्याण का मार्ग बताता हूँ। तुम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की 'योगिनी एकादशी' का पूरी निष्ठा से व्रत करो।
हेममाली ने ऋषि के कथनानुसार योगिनी एकादशी का व्रत और पूजन किया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उसका कोढ़ पूरी तरह ठीक हो गया, उसे सुंदर शरीर वापस मिला और वह पुनः अपनी पत्नी के साथ सुखी जीवन जीने लगा।
Published By : Aarya Pandey
पब्लिश्ड 10 July 2026 at 08:32 IST