Ahoi Ashtami 2026: 1 या 2 नवंबर कब है अहोई अष्टमी, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और महत्व
अहोई अष्टमी माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए करती हैं। यह विशेष रूप से माताओं का संतान के लिए एक कठिन और फलदायी व्रत माना जाता है। अब ऐसे में 1 या 2 नवबंर अहोई अष्टमी कब है? आइए जानते हैं।
- धर्म और अध्यात्म
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अहोई अष्टमी का व्रत सनातन संस्कृति में विशेष स्थान रखता है। यह पर्व मुख्य रूप से संतान की मंगलकामना, दीर्घायु और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो माताएं सच्चे मन से अहोई माता की आराधना करती हैं, उन पर और उनकी संतान पर सदैव माता की कृपा बनी रहती है।
यह व्रत केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि यह एक मां के निस्वार्थ प्रेम, असीम वात्सल्य और परिवार के प्रति उसके समर्पण का सबसे सुंदर प्रतीक है। इसके साथ ही, संतान प्राप्ति की चाह रखने वाली महिलाएं भी इस दिन विधि-विधान से व्रत रखकर माता से आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। आइए जानते हैं साल 2026 में अहोई अष्टमी की सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और इससे जुड़ी मुख्य परंपराएं।
अहोई अष्टमी 2026 की शुभ तिथि और मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, अहोई अष्टमी का यह पावन पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। साल 2026 में अष्टमी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर, रविवार को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर होगा और इसका समापन 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट पर होगा। उदयातिथि की मान्यता के अनुसार, इस वर्ष अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। इस दिन माताएं पूरे दिन निर्जला या अपनी क्षमतानुसार उपवास रखती हैं।
पूजा का शुभ समय और संध्या मुहूर्त
अहोई अष्टमी के दिन संध्याकाल की पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दिन शाम के समय माता की आराधना करने और आकाश में तारे देखने के बाद ही व्रत पूरा किया जाता है।
पूजा का शुभ मुहूर्त- शाम 05:36 बजे से 06:54 बजे तक
संध्या समय तारों के दर्शन- लगभग शाम 06:00 बजे के आसपास
चंद्रोदय का समय- रात्रि 11:40 बजे के करीब (कुछ परंपराओं में चंद्रमा को अर्घ्य देने का भी विधान है)
विधि-विधान से ऐसे करें अहोई माता की पूजा
अहोई अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके पश्चात घर की उत्तर-पूर्व दिशा या किसी पवित्र स्थान की दीवार पर गेरू से अहोई माता और उनके सात पुत्रों का चित्र बनाएं या बाजार से लाई गई तस्वीर स्थापित करें।
पूजा के दौरान माता को रोली, अक्षत (चावल), पुष्प, धूप, दीपक और मिष्ठान्न अर्पित करें। इसके बाद हाथ में गेहूं के दाने लेकर अहोई अष्टमी की पौराणिक व्रत कथा सुनें या पढ़ें। अंत में माता की आरती करें और अपनी संतान के निरोगी जीवन और सफलता के लिए प्रार्थना करें।
तारों को अर्घ्य देकर खोला जाता है व्रत
इस व्रत की सबसे प्रमुख विशेषता शाम को तारों के दर्शन करना है। दिनभर कठिन उपवास रखने के बाद, माताएं शाम को आसमान में तारे निकलने का इंतजार करती हैं। तारे दिखाई देने के बाद उन्हें जल या दूध से अर्घ्य दिया जाता है और अपनी संतान की लंबी उम्र की कामना की जाती है। इसके पश्चात ही महिलाएं अन्न और जल ग्रहण करके अपने व्रत का पारण करती हैं। कुछ क्षेत्रों में चांद निकलने पर चंद्रमा को देखने के बाद भी व्रत खोलने की परंपरा का पालन किया जाता है।
Published By : Aarya Pandey
पब्लिश्ड 30 October 2026 at 16:29 IST