निषाद पार्टी और सपा के गठजोड़ की अफवाह ‘साइकिल’ की ‘बेबसी’, NDA की मजबूती की गवाही देते संजय निषाद के तीखे बयान

राजनीति में अफवाहें तब तक जीवित रहती हैं, जब तक उन्हें काटने वाला स्पष्ट स्वर न आए। संजय निषाद का स्वर इस बार असामान्य रूप से तीखा है। तीखापन प्रायः कमजोरी नहीं, स्थिति की स्पष्टता से जन्म लेता है। उन्होंने एनडीए को कमजोर नहीं, मजबूत बताया। उन्होंने अपनी पार्टी को किसी की बैसाखी का मोहताज नहीं बताया।

निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद | Image: X

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावों से ठीक पहले अफवाहें केवल सूचना नहीं होतीं, वे अक्सर किसी दल की आंतरिक बेचैनी का आईना बन जाती हैं। पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर यह चर्चा तेज हुई कि आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और निषाद पार्टी का कोई नया गठबंधन बन सकता है। दिलचस्प यह है कि इन चर्चाओं का स्रोत प्रायः वे ही हैंडल हैं, जो सपा के प्रखर समर्थक माने जाते हैं। प्रश्न यह है कि ऐसी अटकलें इतनी तेजी से क्यों फैलाई जा रही हैं और उनके सामने संजय निषाद के बयान इतने तीखे क्यों हो गए हैं।

माता प्रसाद पांडेय से संजय निषाद की मुलाकात को सामान्य शिष्टाचार से आगे बढ़ाकर गठबंधन की संभावना में बदल देना सियासी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन इसके तुरंत बाद निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री का रुख साफ हो गया। उन्होंने कहा कि जिनके घर शीशे के बने होते हैं, वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते। उन्होंने सपा को सलाह दी कि निषाद पार्टी के भविष्य पर अनर्गल टिप्पणी करने के बजाय पहले अपने गिरेबान में झांके। यह भाषा सामान्य राजनीतिक जवाब नहीं थी। यह उस आत्मविश्वास की भाषा थी, जो सहयोगी दल तब बोलता है जब वह अपने गठबंधन की स्थिति को कमजोर नहीं, मजबूत मानता हो।

संजय निषाद का यह कहना कि निषाद पार्टी को सपा की किसी बैसाखी की जरूरत नहीं, जबकि सपा अभी कांग्रेस की बैसाखी भी नहीं जुटा पाई है, महज व्यंग्य नहीं है। यह वर्तमान समीकरण की कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करता है। समाजवादी पार्टी लंबे समय से विपक्षी मोर्चे को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश कर रही है, पर कांग्रेस के साथ सीटों का स्पष्ट बंटवारा अभी भी अधर में है। ऐसी स्थिति में दूसरे दल के राजनीतिक भविष्य की चिंता करना अपने कमजोर मोर्चे को छिपाने का प्रयास लगता है। जब कोई दल दूसरों के दरवाजे पर दस्तक देने की अफवाह स्वयं फैलाता है, तो वह अक्सर अपनी अकेली पड़ती स्थिति को छिपाने का प्रयास करता है।

इतिहास इस बात की गवाही देता है कि निषाद पार्टी और सपा का रिश्ता सहज विश्वास का नहीं रहा। 2018-19 के दौर में गोरखपुर जैसे क्षेत्रों में अस्थायी निकटता बनी, पर वह टिकाऊ नहीं हुई। कसरवल कांड की स्मृति निषाद समाज में अब भी जीवित है। संजय निषाद ने उसी घाव को छूते हुए कहा कि हक मांगने पर गोलियां चलवाने वाले अब हितैषी बनने का ढोंग न करें। यह वाक्य केवल आरोप नहीं, राजनीतिक स्मृति का आह्वान है। कोई समाज उस दल के साथ आसानी से नहीं जुड़ता, जिसे वह अपने ऊपर हुए अन्याय का भागीदार मानता हो। ऐसे में सोशल मीडिया पर गठजोड़ की चर्चा करना यथार्थ से अधिक मनोकामना लगता है।

एनडीए में निषाद पार्टी की स्थिति को संजय निषाद ने ‘बराबरी और हिस्सेदारी का गठबंधन’ कहा। यह वाक्य महत्वपूर्ण है। छोटे सहयोगी दल अक्सर सत्ताधारी दल के अनुग्रह पर निर्भर दिखते हैं, पर निषाद ने स्पष्ट किया कि उनका गठबंधन दया का नहीं, दावे का है। निषाद समाज पूर्वांचल की राजनीति में निर्णायक भूमिका रखता है। उसकी संख्या भले सीमित लगे, प्रभाव कई दर्जन सीटों तक फैला हुआ है। यही कारण है कि 2027 के चुनाव से पहले सीटों और आरक्षण की मांग को लेकर निषाद पार्टी दबाव बना रही है। यह दबाव गठबंधन तोड़ने का संकेत नहीं, गठबंधन के भीतर अपनी कीमत बढ़ाने की क्लासिक रणनीति है।

विडंबना यह है कि सपा समर्थित चर्चाएं उसी समय तेज हुईं, जब निषाद ने भाजपा से अधिक जगह और समुदाय की लंबित मांगों का उल्लेख किया। कुछ लोगों ने इसे पलट जाने का संकेत समझ लिया। पर अगले ही दिन आया तीखा पलटवार उस संभावना को काटता प्रतीत होता है। उन्होंने पूछा कि संजय निषाद कहां जाएंगे, यह प्रश्न गौण है; असल प्रश्न यह है कि शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव स्वयं कहां ठहरेंगे। यह वाक्य सपा के आंतरिक विवाद पर चोट करता है।

सोशल मीडिया की यह मुहिम एक और संदेश देती है। सपा अब अकेले लड़ने के आत्मविश्वास में कमी महसूस कर रही है। विपक्ष को व्यापक सामाजिक गठजोड़ की जरूरत है, पर वह गठजोड़ अभी कागजों पर अधिक और जमीन पर कम दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में निषाद पार्टी जैसी ताकत को अपनी ओर खींचने की अफवाह फैलाना रक्षात्मक कदम है। यह हमला नहीं, रक्षा है। यह विजय का उद्घोष नहीं, अकेले पड़ जाने का भय है।

राजनीति में अफवाहें तब तक जीवित रहती हैं, जब तक उन्हें काटने वाला स्पष्ट स्वर न आए। संजय निषाद का स्वर इस बार असामान्य रूप से तीखा है। तीखापन प्रायः कमजोरी नहीं, स्थिति की स्पष्टता से जन्म लेता है। उन्होंने एनडीए को कमजोर नहीं, मजबूत बताया। उन्होंने अपनी पार्टी को किसी की बैसाखी का मोहताज नहीं बताया। उन्होंने सपा को सलाह दी कि पहले अपना वजूद संभाले। इन वाक्यों को जोड़कर देखने पर चित्र साफ होता है-चक्र प्रतीक वाले दल की बेचैनी बढ़ रही है, जबकि निषाद पार्टी अपने वर्तमान गठबंधन में सौदेबाजी की स्थिति में खड़ी है।

2027 अभी दूर है, पर समीकरण बनने शुरू हो चुके हैं। छोटे दल अपनी कीमत बता रहे हैं, बड़े दल अपनी सीमाएं टटोल रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में सोशल मीडिया की अफवाहें सच का स्थान नहीं ले सकतीं। वे केवल यह बताती हैं कि किस दल को दूसरों के सहारे की कितनी जरूरत महसूस हो रही है। निषाद-सपा गठजोड़ की चर्चा यदि सच होती, तो संजय निषाद की भाषा इतनी कठोर नहीं होती। उनकी भाषा बताती है कि वे सपा की ओर नहीं देख रहे, सपा उन्हें अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही है। और जब खींचने की कोशिश अफवाह का रूप ले लेती है, तो वह शक्ति नहीं, विवशता का प्रमाण बन जाती है।

अंततः उत्तर प्रदेश की राजनीति भावनाओं से नहीं, सामाजिक समीकरणों और संगठनात्मक क्षमता से तय होती है। निषाद समाज अपने हितों को लेकर पहले से अधिक मुखर है। सपा को यदि विस्तार चाहिए तो अफवाहों से नहीं, विश्वास और पुरानी कटुताओं के ईमानदार समाधान से मार्ग बनेगा। फिलहाल संजय निषाद के बयान एनडीए की आंतरिक मजबूती का संकेत देते हैं, जबकि गठजोड़ की अफवाहें साइकिल के अकेलेपन की कहानी कहती हैं। राजनीति में कहानी वही चलती है, जो मैदान में टिक सके। अफवाहें मैदान नहीं बदलतीं, वे केवल यह बताती हैं कि मैदान किस ओर झुक रहा है।


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Disclaimer: इस आर्टिकल में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

Published By : Sujeet Kumar

पब्लिश्ड 18 September 2026 at 16:36 IST