कृतज्ञता भी एक आंदोलन: निशांत ने क्यों किया उन लोगों को सम्मानित करने का आयोजन, जिन्होंने उन्हें फिर खड़ा होने की ताकत दी
“विल ऑन व्हील्ज” मेरे लिए उन लोगों के प्रति आभार जताने का एक तरीका है, जिन्होंने उस समय मेरा साथ दिया जब सब कुछ धुंधला सा लग रहा था।
कहते हैं कि “इम्पॉसिबल” शब्द के भीतर ही “आई एम पॉसिबल” छिपा होता है। इस बात को शायद मुझसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता। जब 23 साल की उम्र में मेरी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगी, तब मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि आगे मेरी जिंदगी कैसी होगी। यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था, इसमें संघर्ष भी कम नहीं रहे। लेकिन जब मैं खुद को फिर से पहचानने की कोशिश कर रहा था, तब कुछ लोग ऐसे थे जो मेरे साथ चट्टान की तरह खड़े रहे।
“विल ऑन व्हील्ज” मेरे लिए उन लोगों के प्रति आभार जताने का एक तरीका है, जिन्होंने उस समय मेरा साथ दिया जब सब कुछ धुंधला सा लग रहा था। मेरे परिवार, दोस्त, डॉक्टर, मार्गदर्शक और दिव्यांगों की मदद करने वाले लोग—ये सब अब मेरी यात्रा का हिस्सा हैं। सच कहूं तो अगर ये लोग मुझे मेरी क्षमता याद न दिलाते, तो शायद मुझे आगे बढ़ने की दिशा ही नहीं मिलती। जब मैं अपनी स्थिति के साथ जीना सीख रहा था, तब मेरे साथियों ने मुझे रास्ता दिखाया। परिवार, दोस्तों और मार्गदर्शकों ने हमेशा हौसला बढ़ाया। डॉक्टरों ने शारीरिक और मानसिक रूप से संभलने में मदद की। इन लोगों के लिए मेरी चोट नहीं, बल्कि मैं महत्वपूर्ण था।
कभी मुझे उनकी दया महसूस नहीं हुई। इसके बजाय उन्होंने मुझे सही सलाह दी, पुनर्वास का रास्ता दिखाया और भरोसा दिलाया। उन्होंने सिखाया कि अपनी स्थिति को स्वीकार करो और हर हाल में आगे बढ़ते रहो। धीरे-धीरे मेरी जिंदगी में बेबसी की जगह इंसानियत की खूबसूरती नजर आने लगी। उन्होंने मुझे यह समझाया कि दिव्यांगता मेरी पहचान नहीं है। मेरी पहचान इस बात से बनती है कि मैं अपनी जिंदगी कैसे जीता हूं। “विल ऑन व्हील्ज” उसी साथ और भरोसे का जश्न है।
मेरे सबसे कठिन दौर में नीना फाउंडेशन ने मुझे सहारा दिया और एक व्यवस्थित पुनर्वास प्रक्रिया से जोड़ा। चोट के बाद की अनिश्चितता से बाहर निकलने में उन्होंने बहुत मदद की। उनका नजरिया सिर्फ शारीरिक इलाज तक सीमित नहीं था। वहां मैंने सीखा कि सम्मान, आत्मविश्वास और साहस भी उतने ही जरूरी हैं जितनी शारीरिक रिकवरी। दिव्यांग लोगों के लिए अपने जीवन पर नियंत्रण महसूस करना बहुत जरूरी होता है, और नीना फाउंडेशन ने मुझे यह एहसास दिलाया।
मेरी जिंदगी में एक और अहम व्यक्ति हैं अरविंद प्रभू, जिनके साथ मैंने व्हीलचेयर पर पूरे देश की यात्रा की। जो चीज कभी असंभव लगती थी, उसे अरविंद ने मेरे लिए संभव बना दिया। हम दोनों ने मिलकर एक्सेस फॉर ऑल की पहल भी शुरू की, ताकि शहरों में ऐसे लोगों को आसानी से आने-जाने में मदद मिल सके जिन्हें चलने-फिरने में दिक्कत होती है। इसके साथ ही हम ऐसी इन्फ्रास्ट्रक्चर योजना पर सलाह भी देते हैं, जो दिव्यांग लोगों के लिए ज्यादा अनुकूल हो। अब मेरी यात्रा का मकसद भी यही है कि दिव्यांग लोग अपनी आवाज खुद उठा सकें।
“विल ऑन व्हील्ज” मेरे लिए एक खास पड़ाव का जश्न है। व्हीलचेयर का इस्तेमाल करते हुए मुझे 25 साल हो चुके हैं, और मेरे लिए यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। यहां तक पहुंचने में बहुत से लोगों ने मेरा साथ दिया। जिन लोगों का जिक्र मैंने किया, उन्होंने मेरे साथ हर चुनौती का सामना किया। यह आयोजन उनके उसी प्रयास को सम्मान देने का एक छोटा सा तरीका है, जिसने मुझे दोबारा मजबूत बनाया और खुद पर भरोसा करना सिखाया।
यह भी सच है कि किसी चोट या दिव्यांगता से उबरने की प्रक्रिया अकेले पूरी नहीं होती। इसके लिए समर्पित संस्थाओं जैसे नीना फाउंडेशन, समाधान देने वाली पहलों जैसे एक्सेस फॉर ऑल, परिवार और दोस्तों का साथ, और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भूमिका बहुत अहम होती है।
मेरा मानना है कि आभार व्यक्त करना बहुत जरूरी है। इससे लोगों के बीच भरोसा बढ़ता है और रिश्ते मजबूत होते हैं। सबसे अहम बात यह है कि किसी घायल या दिव्यांग व्यक्ति की पूरी तरह से ठीक होने की प्रक्रिया अकेले संभव नहीं होती। जब हम अपने आसपास के लोगों के प्रयासों को स्वीकार करते हैं, तो उन्हें भी लगता है कि उनका साथ मायने रखता है। इससे वे आगे भी दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित होते हैं।
Published By : Sakshi Bansal
पब्लिश्ड 27 March 2026 at 15:00 IST