काशी से जेवर तकः उत्तर प्रदेश की टेक्नोक्रांति से विकास की रफ्तार होगी तेज

एक लाख करोड़ का निर्यात मंजिल नहीं, एक पड़ाव है जिसकी दिशा स्पष्ट है। जेवर की चिप इकाई, लखनऊ के आईटी पार्क, प्रस्तावित जापान सिटी और काशी के रुद्राक्ष में बसा आबे मेमोरियल कॉरिडोर, ये सब मिलकर एक नए उत्तर प्रदेश का नक्शा गढ़ रहे हैं, जिसकी पृष्ठभूमि में राज्य का आर्थिक भूगोल है।

 
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Noida International Airport | Image: @myogiadityanath

प्रो. पुनीत कुमार

काशी के रुद्राक्ष इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में बुधवार को आबे मेमोरियल कॉरिडोर के उद्घाटन को सिर्फ एक स्मृति के रूप में न देखकर इसे व्यापक दृष्टि दें तो इसमें उत्तर प्रदेश की वह टेक्नोक्रांति भी दिखाई देगी जो अब पूरे देश में भारत की पहचान बनती जा रही है। जापान के पूर्व प्रधानमंत्री आबे शिंजों की स्मृति में बने इस कारिडोर का संदर्भ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि इसके साथ साथ योगी सरकार में जापान की पूंजी और तकनीक यमुना एक्सप्रेसवे के औद्योगिक गलियारों की ओर बढ़ रही है और कारखानों, चिप इकाइयों और आईटी पार्कों में आकार ले रही है। साथ यह संदेश भी दे रही है कि उत्तर प्रदेश अब उपभोक्ता नहीं, उत्पादक राज्य है। जो प्रदेश दुनिया का माल खरीदता था, उसकी मेधा अब अपना माल पूरी दुनिया को दे रहा है। लखनऊ के आईटी पार्कों से जेवर की चिप इकाई तक, एक लाख करोड़ के पार पहुंचे निर्यात से काशी के रुद्राक्ष में बसी जापान की मित्रता तक, सब उत्तर प्रदेश की टेक्नोक्रांति के अध्याय हैं। 

उपभोक्ता वह है जो प्रतीक्षा करता है कि कोई और माल बनाए और वह उससे खरीद करे। उत्पादक वह है जो पहल करता है, जोखिम उठाता है और अपने श्रम से मूल्य गढ़ता है। यह विडंबना ही है कि एक दशक पहले तक उत्तर प्रदेश के हिस्से में सिर्फ उपभोक्ता की ही भूमिका थी। विशाल आबादी वाले इस प्रदेश में दुनिया भर का सामान बिकता था, बनता कम था। जो धरती सभ्यता की जननी रही, वह अर्थव्यवस्था की कतार में खरीदार बनकर खड़ी रही, और उसके युवा रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों की ट्रेन पकड़ते रहे। हमारे नीति ग्रंथों में कहा गया है कि कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, इच्छा मात्र से नहीं। योगी सरकार में सभी ने परिश्रम के साथ इच्छाशक्ति को भी देखा, जिसके परिणाम अब सामने हैं। उत्तर प्रदेश के प्रति धारणाएं टूटी हैं और आंकड़े, परियोजनाएं और विदेशी साझेदारों का भरोसा, तीनों उत्तर प्रदेश के सामर्थ्य को प्रदर्शित करते हैं।

किसी अर्थव्यवस्था की पहचान उसके निर्यात से होती है, क्योंकि निर्यात का अर्थ है कि दुनिया आपकी बनाई चीज या दी हुई सेवा के लिए भुगतान कर रही है। इसका बड़ा उदाहरण आईटी और आईटीईएस निर्यात का है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में प्रदेश से 1,01,970 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपी का निर्यात पहली बार एक लाख करोड़ के पार हुआ है। पांच साल पहले, 2020-21 में यह आंकड़ा 48,004 करोड़ रुपये था। यानी 53,966 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी और करीब 112 प्रतिशत का उछाल। इस वृद्धि की बनावट भी संतुलित है। सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया की इकाइयों से निर्यात 25,642 करोड़ से बढ़कर 52,778 करोड़ रुपये हुआ, यानी 27,136 करोड़ की बढ़त और 15.5 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक दर। विशेष आर्थिक क्षेत्रों से निर्यात 22,362 करोड़ से बढ़कर 49,192 करोड़ रुपये पहुंचा, यानी 26,830 करोड़ की बढ़त और 17.1 प्रतिशत की दर। दोनों इंजन साथ चल रहे हैं और यही किसी उभरते औद्योगिक राज्य की सेहत का संकेत है।

इसके सामाजिक पक्ष पर भी बात की जानी चाहिए जिसके मायने आंकड़ों से अधिक हैं। दस वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के युवाओं को बेहतर करियर के लिए दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद की ओर जाना पड़ता था। आज लखनऊ में आईबीएम, जेनपैक्ट और टेलीपरफॉर्मेंस जैसी कंपनियों के कार्यालय हैं। एचसीएल आईटी सिटी के फेज-2 में करीब 500 करोड़ रुपये के निवेश से लगभग छह हजार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार की उम्मीद है। नोएडा आईटी का बहुत बड़ा केंद्र बन ही चुका है। जब रोजगार घर की देहरी पर मिलने लगता है, तो प्रतिभा का पलायन थमता है। रोजगार के अवसर बढ़े हैं तो युवाओं का पलायन भी रुका है। यानी राज्य की युवा शक्ति अब उसकी ताकत है और उसकी क्षमता का लाभ भी राज्य को ही मिल रहा है।

राज्य में युवा शक्ति की यह क्षमता तकनीकी क्षेत्र में स्पष्ट दिखाई देती है। साढ़े नौ वर्ष के भीतर देश के करीब 60 प्रतिशत मोबाइल फोन और 55 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट के उत्पादन में प्रदेश की हिस्सेदारी हो गई है। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 3,800 करोड़ से बढ़कर 45 हजार करोड़ रुपये पर पहुंच चुका है और लक्ष्य 2030 तक दो लाख करोड़ का है। जेवर में 3,706 करोड़ रुपये की एचसीएल-फॉक्सकॉन चिप इकाई बन रही है। 644 मेगावाट के डेटा सेंटर प्रस्ताव आ चुके हैं, और प्रदेश में 24,000 से अधिक स्टार्टअप और आठ यूनिकॉर्न हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शब्दों में कहा जाए तो यात्रा मोबाइल से मॉड्यूल और मॉड्यूल से माइक्रोचिप तक पहुंच रही है।

टेक्नोलाजी को लेकर लखनऊ की महत्वाकांक्षा भी कम नहीं है। राजधानी को एआई, सेमीकंडक्टर, साइबर सिक्योरिटी और कंप्यूटिंग टेक्नोलॉजी का केंद्र बनाने और 50 विश्वस्तरीय एआई स्टार्टअप खड़े करने का योगी सरकार का लक्ष्य है। आईटी-आईटीईएस निर्यात को अगले चार वर्षों में 2.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने का भी संकल्प चुनौतीपूर्ण तो है लेकिन यदि पांच वर्षों में निर्यात दोगुने से अधिक हो सकता है तो यह भी असंभव नहीं। इसी पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री का जापान और सिंगापुर का दौरा देखा जाना चाहिए। इस यात्रा में करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिले। यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र में 500 एकड़ में जापान सिटी विकसित करने और इन्वेस्ट यूपी के जापान डेस्क को सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय की निगरानी में मजबूत करने की घोषणा महत्वपूर्ण है। 

जापान के साथ इस आर्थिक साझेदारी की जड़ें उस रिश्ते में हैं जो काशी से शुरू हुई थीं और आबे मेमोरियल कारिडोर इस रिश्ते को और मजबूत करने वाला स्तंभ है। 
उपभोक्ता से उत्पादक बनने का अर्थ केवल उद्योग लगाना नहीं, सोच बदलना है। उत्पादक पहल करता है, जोखिम उठाता है और मूल्य सृजित करता है। गीता का ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ यही कहता है कि अधिकार कर्म पर है, परिणाम पर नहीं। प्रदेश के युवाओं ने स्टार्टअप, कोडिंग लैब और कारखानों की शॉप फ्लोर पर यही कर्म-संस्कृति अपनानी शुरू कर दी है। इसलिए एक लाख करोड़ का निर्यात मंजिल नहीं, एक पड़ाव है जिसकी दिशा स्पष्ट है। जेवर की चिप इकाई, लखनऊ के आईटी पार्क, प्रस्तावित जापान सिटी और काशी के रुद्राक्ष में बसा आबे मेमोरियल कॉरिडोर, ये सब मिलकर एक नए उत्तर प्रदेश का नक्शा गढ़ रहे हैं, जिसकी पृष्ठभूमि में राज्य का आर्थिक भूगोल है।

 (लेखक पुनीत कुमार लखनऊ यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ फिजिक्स में प्रोफेसर हैं)

Disclaimer: इस आर्टिकल में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

Published By : Sujeet Kumar

पब्लिश्ड 8 October 2026 at 20:12 IST