लंदन में मनोचिकित्सक, अब हरिद्वार से नई पीढ़ी को दिशा: कौन हैं डॉ. चिन्मय पंड्या, जिनके हाथ में है गायत्री परिवार के शताब्दी समारोह की कमान

डॉ. चिन्मय पंड्या गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य और वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा के नाती हैं। उनके पिता डॉ. प्रणव पंड्या गायत्री परिवार के प्रमुख और देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं।

 
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Dr. Chinmay Pandya | Image: Republic

फरवरी 1978 में एक परिवार इंदौर छोड़कर हरिद्वार के शांतिकुंज आश्रम में बसने आया। परिवार में एक डॉक्टर पिता थे, मनोविज्ञान पढ़ी हुई मां थीं और करीब डेढ़ साल का एक बच्चा था। वह बच्चा आश्रम के माहौल में बड़ा हुआ, डॉक्टर बना और लंदन में मनोचिकित्सक के रूप में अपनी पहचान बनाई। फिर एक दिन सब छोड़कर वापस हरिद्वार लौट आया।

आज यही बच्चा, डॉ. चिन्मय पंड्या, अखिल विश्व गायत्री परिवार के जन्मशताब्दी समारोह की अगुवाई कर रहे हैं। 31 अक्टूबर से 2 नवंबर तक दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में होने वाले महोत्सव से पहले वे पिछले कई महीनों से देश के अलग-अलग राज्यों में घूम रहे हैं।

आश्रम में बीता बचपन

डॉ. चिन्मय पंड्या गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य और वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा के नाती हैं। उनके पिता डॉ. प्रणव पंड्या गायत्री परिवार के प्रमुख और देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं। उनकी माँ शैलबाला पंड्या शांतिकुंज की प्रमुख हैं।
गायत्री परिवार की वेबसाइट के अनुसार, शैलबाला पंड्या फरवरी 1978 में इंदौर छोड़कर अपने पति और डेढ़ साल के बेटे चिन्मय के साथ शांतिकुंज आ गई थीं। यानी चिन्मय पंड्या का बचपन उसी आश्रम में बीता, जहाँ 1926 से जल रहा अखंड दीप रखा है और जहाँ से आज पूरा शताब्दी वर्ष चलाया जा रहा है।

डॉक्टरी, लंदन और डिमेंशिया के मरीज

आश्रम में पले-बढ़े चिन्मय ने करियर के लिए मेडिकल का रास्ता चुना, ठीक अपने पिता की तरह, जो ख़ुद गोल्ड मेडल पाने वाले एमडी डॉक्टर रहे हैं। भारत में मेडिकल की पढ़ाई के बाद वे आगे की ट्रेनिंग के लिए ब्रिटेन गए। वहाँ उन्होंने मनोचिकित्सा में विशेषज्ञता हासिल की और रॉयल कॉलेज ऑफ़ साइकियाट्रिस्ट्स की सदस्यता (MRCPsych) प्राप्त की। यह ब्रिटेन में मनोचिकित्सकों की प्रतिष्ठित योग्यता मानी जाती है।लंदन में उन्होंने ब्रिटेन की सरकारी स्वास्थ्य सेवा नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) में काम किया। वे वेस्ट लंदन मेंटल हेल्थ ट्रस्ट में बुज़ुर्गों से जुड़ी सेवाओं में एसोसिएट स्पेशलिस्ट के पद तक पहुँचे। उनका काम ख़ास तौर पर डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर से जूझ रहे मरीज़ों के इलाज पर केंद्रित था।

"भीतर की आवाज़" पर वापसी

लंदन में एक जमा-जमाया करियर था, लेकिन 2010 में डॉ. चिन्मय पंड्या भारत लौट आए। गायत्री परिवार के अनुसार उन्होंने यह फ़ैसला अपने भीतर की आवाज़ सुनकर लिया। लौटकर वे हरिद्वार के देव संस्कृति विश्वविद्यालय से जुड़ गए, जहाँ आज वे प्रतिकुलपति (प्रो-वाइस चांसलर) हैं।
यह कहानी इस परिवार में पहली बार नहीं दोहराई गई। 1978 में उनके पिता डॉ. प्रणव पंड्या को भी अमेरिका में नौकरी के अच्छे मौके मिले थे, लेकिन गुरुदेव के कहने पर उन्होंने भारत में रहकर शांतिकुंज से जुड़ना चुना। दो पीढ़ियों में दो डॉक्टरों का विदेश के अवसरों की जगह हरिद्वार चुनना इस परिवार की सोच के बारे में बहुत कुछ बताता है। मनोचिकित्सा से उनका रिश्ता लौटने के बाद भी पूरी तरह टूटा नहीं। ऋषिहुड यूनिवर्सिटी की वेबसाइट के अनुसार, वे आज भी बिना कोई फ़ीस लिए मरीज़ों को देखते हैं।

विज्ञान और अध्यात्म के बीच पुल

एक मनोचिकित्सक का आध्यात्मिक संस्था की अगुवाई करना कुछ लोगों को अलग लग सकता है। लेकिन गायत्री परिवार की पहचान ही विज्ञान और अध्यात्म को साथ लाने की रही है, और डॉ. चिन्मय पंड्या इसी सोच के एक चेहरे के रूप में देखे जाते हैं।
वे भारतीय योग संघ (इंडियन योग एसोसिएशन) के उपाध्यक्ष हैं और विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका "देव संस्कृति" के संपादक भी हैं। ऋषिहुड यूनिवर्सिटी के अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की योग विशेषज्ञों की सूची में उनका नाम शामिल है। वे भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की गवर्निंग बॉडी और आयुष मंत्रालय की सलाहकार परिषद से भी जुड़े रहे हैं।

उनकी बात कई बड़े मंचों तक पहुँची है। गायत्री परिवार के अनुसार, वे संयुक्त राष्ट्र के वियना मुख्यालय, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और लंदन के लैम्बेथ पैलेस में बोल चुके हैं। भारत में आईआईटी, आईआईएम, भारतीय सैन्य अकादमी, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और डीआरडीओ जैसे संस्थानों में भी उन्होंने व्याख्यान दिए हैं। यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी अंतर-सरकारी बैठक में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया है।

नई तकनीक के सवालों पर भी वे खुलकर बोलते हैं। इसी साल फरवरी में दिल्ली के भारत मंडपम में उन्होंने लोकतंत्र के लिए एथिकल एआई (नैतिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता) पर अपने विचार रखे। संयुक्त राष्ट्र की संस्था ITU के "AI for Good" मंच पर भी वे वक्ता के रूप में शामिल रहे हैं। वहाँ उनके परिचय में लिखा है कि उनका काम नैतिक नेतृत्व, संपूर्ण स्वास्थ्य और मूल्यों पर आधारित सोच को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

शताब्दी वर्ष के “दलनायक”

2026 गायत्री परिवार के लिए तीन शताब्दियों का साल है। इसमें माता भगवती देवी शर्मा के जन्म के सौ साल, अखंड दीप के सौ साल और गुरुदेव की साधना के सौ साल शामिल हैं। इस पूरे समारोह की कमान डॉ. चिन्मय पंड्या के पास है, जिन्हें संस्था "दलनायक" कहती है।
तैयारियाँ एक साल पहले से शुरू हो गई थीं। सितंबर 2025 में उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर उन्हें समारोह का न्योता दिया था। जनवरी 2026 में हरिद्वार में हुए पहले चरण के आयोजन में अमित शाह शामिल भी हुए। इसके बाद से डॉ. पंड्या लगातार अलग-अलग राज्यों के दौरे पर रहे हैं, ताकि कार्यकर्ताओं और आम लोगों को दिल्ली के आयोजन से जोड़ा जा सके।

इस महीने भारत मंडपम में एक हज़ार से ज़्यादा कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में उनका संदेश साफ था: "जिस दिन भारत जागेगा, उस दिन दुनिया जागेगी।" उन्होंने कहा कि भारत तभी महान बन सकता है जब सभी भारतीय एक होकर खड़े हों, और जाति व क्षेत्र के नाम पर बँटवारा देश को कमज़ोर करता है। उनके अनुसार तीनों शताब्दियाँ एक ही बात सिखाती हैं: साधना को सेवा में बदलना, अच्छे विचारों को रोज़ के व्यवहार में उतारना और आस्था को समाज के बदलाव की ताकत बनाना। ज्योति कलश रथ यात्रा को उन्होंने जन्मशताब्दी समारोह को "जन-उत्सव" बनाने की दिशा में अहम कदम बताया।

परिवार में सबकी अपनी भूमिका

शताब्दी वर्ष में यह परिवार अलग-अलग मोर्चों पर सक्रिय है। माँ शैलबाला पंड्या ने इसी महीने शांतिकुंज से ज्योति कलश रथों को रवाना किया। डॉ. चिन्मय पंड्या की पत्नी शेफाली पंड्या गायत्री विद्यापीठ की अध्यक्ष हैं और शांतिकुंज के महिला मंडल की अगुवाई करती हैं। इस साल संस्था ने नारी सशक्तिकरण पर जो ज़ोर दिया है, उसमें उनकी अहम भूमिका है।

आगे की क्या है योजना

दिल्ली का महोत्सव डॉ. चिन्मय पंड्या के लिए साल भर की मेहनत का अहम पड़ाव है। उनके अनुसार यह आयोजन शताब्दी वर्ष में लिए गए संकल्पों की समीक्षा करने और आने वाले सालों की योजना बनाने का मौका होगा। हरिद्वार के आश्रम में बीता बचपन, लंदन के अस्पतालों में मरीज़ों के साथ बिताए साल और फिर वापसी: डॉ. चिन्मय पंड्या का यह सफ़र गायत्री परिवार की उसी सोच की मिसाल है, जिसमें आधुनिक ज्ञान और भारतीय परंपरा एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि साथ-साथ चलते हैं।

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Published By : Rupam Kumari

पब्लिश्ड 27 October 2026 at 22:47 IST