अपडेटेड 3 March 2026 at 16:33 IST
भक्त प्रह्लाद की तरह 20 फीट ऊंची जलती होली से गुजर गया युवक, क्या है मथुरा के फालैन गांव की सदियों पुरानी अनोखी परंपरा?
मथुरा के फालैन गांव की अनोखी परंपरा होलिका दहन से जुड़ी हुई है। यह सदियों पुराना रिवाज है जहां एक व्यक्ति भक्त प्रह्लाद का किरदार निभाता है और जलती हुई होलिका की विशाल अग्नि से गुजरता है। हैरानी की बात ये है कि बिना जले सुरक्षित निकल आता है। यह परंपरा प्रह्लाद की भगवान विष्णु में अटूट श्रद्धा को दर्शाती है, जहां पौराणिक कथा के अनुसार होलिका उन्हें जलाने की कोशिश करती है लेकिन खुद जल जाती है।
Mathura Phalain Holika Dahan : भारत की सांस्कृतिक धरोहर में होली का त्योहार रंगों, खुशियों और पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। लेकिन उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित फालैन (Phalain) गांव में यह त्योहार एक अनोखे और रोमांचकारी रूप में मनाया जाता है। यहां होलिका दहन के दौरान एक व्यक्ति भक्त प्रह्लाद का रूप धारण कर जलती हुई होली से गुजरता है और बिना किसी चोट के सुरक्षित निकल आता है। यह परंपरा न केवल श्रद्धा का प्रतीक है बल्कि सदियों पुरानी आस्था की जीवंत मिसाल भी है।
फालैन गांव मथुरा शहर से करीब 50 किलोमीटर दूर है, जो अपने अनोखे रिवाज के लिए प्रसिद्ध है। पौराणिक कथा के अनुसार, दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे। हिरण्यकश्यप को भगवान विष्णु की भक्ति मंजूर नहीं थी। प्रह्लाद बुआ होलिका को ब्रह्मा जी से एक विशेष चुनरी का वरदान प्राप्त था, जिसे पहनकर अग्नि में प्रवेश करने पर वह जल नहीं सकती थी। बुआ होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी, लेकिन प्रह्लाद की भक्ति से होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गए। इसी घटना को फालैन में हर साल होलिका दहन पर दोहराया जाता है।
वसंत पंचमी से शुरू होते हैं अनुष्ठान
गांव के एक ब्राह्मण युवक जिसे 'पांडा' कहा जाता है, जो इस भूमिका को निभाता है। इस रिवाज की प्रक्रिया बेहद कठिन और समर्पित होती है। करीब एक महीने पहले वसंत पंचमी अनुष्ठान से शुरू हो जाते हैं। पांडा स्वयं को पूरी तरह से भक्ति में लीन कर लेते हैं और सभी सांसारिक मोह-माया का त्याग कर देते हैं। बसंत पंचमी से शुरू होकर होलिका दहन तक पांडा प्रह्लाद मंदिर में रहता है। इस दौरान वह ब्रह्मचर्य का पालन करता है और भोजन तक त्याग देते हैं।
नंगे पैर अग्नि के बीच से गुजरता है पांडा
ग्रामीण मानते हैं कि यह तपस्या प्रह्लाद की भक्ति की तरह अग्नि से रक्षा करती है। होलिका की चिता गोबर के उपलों और लकड़ी से बनाई जाती है, जो करीब 20 फीट लंबी और 30 फीट चौड़ी होती है। जैसे ही अग्नि प्रज्वलित होती है, पांडा नंगे पैर उसके बीच से गुजरता है। उसकी बहन पानी छिड़ककर रास्ता बनाती है, जबकि गुरु दूसरी ओर उनका इंतजार करते हैं। हजारों श्रद्धालु और पर्यटक यह चमत्कार देखने आते हैं, और 'भक्त प्रह्लाद की जय' के जयकारे गूंजते हैं।
कब से चली आ रही है परंपरा?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह सत्य युग से है। हर साल एक नया व्यक्ति चुना जाता है, जो इस रिवाज को जीवित रखता है। इस साल संजू पांडा ने यह भूमिका निभाई और उन्होंने कहा कि इस दौरान घर-परिवार का मोह खत्म हो जाता है। यह न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा देता है, क्योंकि देश-विदेश से लोग इसे देखने आते हैं।
Published By : Sagar Singh
पब्लिश्ड 3 March 2026 at 16:33 IST