बुलंदशहर में एफपीओ के जरिए शुरू हुआ पायलट प्रोजेक्ट, 15 गांवों में खोली गईं गोमूत्र डेयरी
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीद का पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ है। एफपीओ के जरिए 15 गांवों से रोजाना 500 लीटर गोमूत्र एकत्र कर दवाएं बनाई जा रही हैं। इस योजना में 300 महिलाओं को शेयरहोल्डर बनाकर रोजगार से जोड़ा गया है।
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राघवेंद्र पाण्डेय की रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन के अनुरूप गो संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तीकरण और जैविक खेती से जोड़ने की दिशा में नई पहल शुरू हुई है। बुलंदशहर में किसान उत्पादक संगठन एफपीओ के माध्यम से पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर गोमूत्र की खरीद शुरू की गई है। किसानों और पशुपालकों से 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदा जा रहा है। पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद इस मॉडल को प्रदेश के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने की तैयारी है। इससे गोवंश पालने वाले परिवारों को दूध के साथ गोमूत्र से भी अतिरिक्त आमदनी का रास्ता मिल सकेगा।
बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसैना गांव में डॉ. प्रवीण के नेतृत्व में एफपीओ के जरिए शुरू हुए इस प्रयोग से आसपास के 15 गांवों को जोड़ा गया है। इन गांवों में गोमूत्र एकत्र करने के लिए स्थानीय स्तर पर केंद्र बनाए गए हैं। वर्तमान में इन केंद्रों के माध्यम से प्रतिदिन करीब 500 लीटर गोमूत्र एकत्र किया जा रहा है। आगे खरीद की दर बढ़ाकर इसे 20 रुपये प्रति लीटर करने की भी योजना है।
गांवों में लगाए गए 200 लीटर क्षमता के टैंक
गोमूत्र के संग्रहण के लिए गांवों में 200 लीटर क्षमता के टैंक लगाए गए हैं। इससे पशुपालकों को गोमूत्र बेचने के लिए दूर नहीं जाना पड़ता। गांव में ही इसकी खरीद और संग्रह की व्यवस्था की गई है। स्थानीय स्तर पर संग्रहण की व्यवस्था होने से पशुपालकों, विशेषकर महिलाओं को इससे जोड़ना आसान हुआ है।इस पूरी व्यवस्था में ग्रामीण महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। गांवों में गोमूत्र एकत्र करने में सहयोग करने वाली महिलाओं को प्रति लीटर दो रुपये कमीशन दिया जा रहा है। इससे महिलाओं के लिए भी गांव में रहते हुए अतिरिक्त आमदनी का एक नया जरिया तैयार हुआ है।
300 महिलाएं बनीं शेयरहोल्डर
डॉ. प्रवीण ने बताया कि इस पहल को केवल गोमूत्र की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसे महिला सशक्तीकरण से भी जोड़ा गया है। करीब 300 महिलाओं के सहयोग से यह काम शुरू किया गया है और इन सभी महिलाओं को शेयरहोल्डर बनाया गया है। इससे महिलाएं केवल संग्रहण व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि इस पूरे आर्थिक मॉडल से सीधे जुड़ी हुई हैं। गोमूत्र संग्रह के एवज में मिलने वाला कमीशन महिलाओं के लिए छोटी आय का नियमित साधन बन रहा है। इसका दायरा बढ़ने पर अधिक संख्या में ग्रामीण महिलाओं को इससे जोड़ने की संभावना है। खासतौर पर गोपालन करने वाले परिवारों की महिलाओं के लिए यह घर और गांव में रहते हुए आमदनी बढ़ाने का जरिया बन सकता है।
जड़ी-बूटियों और गोमूत्र से तैयार हो रहीं दवाएं
एकत्र किए गए गोमूत्र का उपयोग खेती के लिए उपयोगी उत्पाद तैयार करने में किया जा रहा है। गोमूत्र में विभिन्न जड़ी-बूटियों को मिलाकर खेतों में इस्तेमाल होने वाली दवाएं तैयार की जाती हैं। इन्हें बाद में समितियों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाया जाता है।
इस मॉडल का उद्देश्य खेती में रासायनिक उत्पादों के विकल्प के रूप में गोमूत्र आधारित उत्पादों को बढ़ावा देना भी है। इससे एक तरफ गोवंश से मिलने वाले उत्पादों का उपयोग बढ़ेगा तो दूसरी तरफ प्राकृतिक और जैविक खेती को भी प्रोत्साहन मिल सकेगा। तैयार उत्पादों की बिक्री समितियों को किए जाने से इसके लिए स्थानीय स्तर पर बाजार की व्यवस्था भी विकसित की जा रही है।
दूध के साथ गोमूत्र से भी होगी कमाई
अभी तक ग्रामीण क्षेत्रों में गोपालन से होने वाली आय मुख्य रूप से दूध और दुग्ध उत्पादों पर निर्भर रहती है। इस प्रयोग के जरिए गोमूत्र को भी आर्थिक संसाधन के रूप में विकसित करने की कोशिश की जा रही है। 10 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीद होने पर पशुपालकों को गोवंश से अतिरिक्त आमदनी हो सकती है। आगे इसे 20 रुपये प्रति लीटर तक ले जाने की योजना सफल होती है तो पशुपालकों की आय में और वृद्धि हो सकती है।
गोवंश से दूध के अतिरिक्त दूसरे उत्पादों के जरिए भी आय होने पर उनके संरक्षण को आर्थिक आधार मिल सकता है। गोमूत्र की नियमित खरीद की व्यवस्था विकसित होने से गोपालकों को पशुओं की देखभाल के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलेगा।
जैविक खेती और गो संरक्षण को एक साथ बढ़ावा
गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि बुलंदशहर में शुरू हुए इस मॉडल को गो संरक्षण, ग्रामीण रोजगार, महिला सशक्तीकरण और जैविक/प्राकृतिक खेती को एक साथ जोड़ने वाले प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। इसमें गांव से गोमूत्र का संग्रह होता है, महिलाओं को इससे आय मिलती है और एकत्र गोमूत्र से खेती के लिए उत्पाद तैयार कर उन्हें समितियों के माध्यम से बाजार तक पहुंचाया जाता है। यह पूरी तरह से केमिकल मुक्त है और फसलों की वृद्धि में सहायक होता है।पायलट प्रोजेक्ट के अनुभवों के आधार पर इसे प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों में विस्तार देने की योजना है। इससे गांवों में गोमूत्र संग्रह केंद्रों का नेटवर्क विकसित होगा, जिससे पशुपालकों के लिए आय का अतिरिक्त स्रोत तैयार होने के साथ गो संरक्षण को भी आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।
Published By : Aarya Pandey
पब्लिश्ड 10 August 2026 at 16:52 IST