अपडेटेड 11 March 2026 at 13:34 IST
गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा कौन? जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छा मृत्यु की इजाजत, 13 साल से हैं कोमा में; फैसला सुनाते रो पड़े जज
सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। 13 साल से वेजिटेटिव स्टेट में रहने वाले हरीश राणा का यह भारत का पहला मामला है। ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए जज भावुक हो गए। जानें क्या कहा?
Supreme Court Euthanasia: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 मार्च) को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए 32 साल के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत दे दी। यह भारत में इस तरह का पहला मामला है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दिल्ली के AIIMS को निर्देश दिए कि राणा को तुरंत भर्ती किया जाए और लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाए। बताया जा रहा है कि निर्णय सुनाते वक्त जज भावुक हो गए।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि जब कोई व्यक्ति कृत्रिम साधनों से जीवित रखा जा रहा हो और उसकी स्थिति में सुधार की कोई उम्मीद न हो, तो उसकी गरिमा को बनाए रखने के लिए इच्छामृत्यु का अधिकार दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय गरिमा को सर्वोपरि माना।
कौन हैं हरीश राणा?
हरीश राणा गाजियाबाद के निवासी हैं। साल 2013 में वे पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे। जहां हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उन्हें गंभीर चोटें आईं। इससे वे ब्रेन इंजरी का शिकार हो गए और परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में चले गए। पिछले 13 साल से राणा क्वाड्रिप्लेजिया (चारों अंगों का लकवा) से पीड़ित हैं। वे सांस लेने के लिए ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब और खाने के लिए गैस्ट्रोजेजुनोस्टॉमी ट्यूब पर निर्भर हैं। डॉक्टरों की रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। वे पूरी तरह से मशीनी जीवन रक्षक प्रणाली पर हैं।
पैसिव यूथेनेशिया क्या है?
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब है मरीज को दिए जा रहे इलाज, दवाओं या लाइफ सपोर्ट को हटा लेना होता है, ताकि प्राकृतिक मौत हो सके। यह एक्टिव यूथेनेशिया से अलग है, जिसमें जहरीला इंजेक्शन देकर मौत दी जाती है।
भारत में एक्टिव यूथेनेशिया प्रतिबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार किसी व्यक्ति को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा कि राणा कभी एक होशियार छात्र थे, लेकिन दुर्घटना ने उन्हें बिस्तर पर ला पटका। मेडिकल रिपोर्ट में 13 साल में कोई प्रगति न होने पर कोर्ट ने यह निर्णय लिया है। यह फैसला उन परिवारों के लिए राहत का संदेश है जो ऐसे मरीजों की देखभाल में संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि, कोर्ट ने सख्त दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।
Published By : Nidhi Mudgill
पब्लिश्ड 11 March 2026 at 13:34 IST