राघव चड्ढा ने केजरीवाल का साथ छोड़ा, BJP में शामिल होने का किया ऐलान; क्या अब भी सांसद बने रहेंगे? समझिए पूरा समीकरण
AAP split Legal Analysis: राघव चड्ढा सहित पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का ऐलान किया है। इस घटना ने राजनीति गलियारों में हलचल मचा दी है, और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये सांसद अपनी सदस्यता बचा पाएंगे?
AAP split Legal Analysis: 24 अप्रैल 2026 को आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए एक बड़ा सियासी मोड़ आया है। राघव चड्ढा सहित पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का ऐलान किया है। इसमें संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, विक्रम साहनी, स्वाति मालीवाल और राजेंद्र गुप्ता शामिल हैं। इस घटना ने राजनीति गलियारों में हलचल मचा दी है, और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये सांसद अपनी सदस्यता बचा पाएंगे? इसका सीधा जवाब भारत के 'दल-बदल कानून' (Anti-Defection Law) में निहित है।
क्या कहती है संविधान की दसवीं अनुसूची?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को रोकना है। सामान्य परिस्थितियों में, यदि कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होता है, तो उसकी सदस्यता रद्द (Disqualified) हो जाती है। लेकिन, इस कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद (Exception) भी है, जिसका इस्तेमाल आज इन सांसदों ने किया है।
विलय में क्या है 2/3 का नियम?
इस कानून के पैरा 4 के अनुसार, यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय (Merge) करते हैं, तो उन्हें 'दलबदल' के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इसे 'विलय' माना जाता है, न कि 'दलबदल'।
AAP का मौजूदा गणित
राज्यसभा में कुल AAP सांसद: 10
विलय के लिए आवश्यक संख्या 2/3 … यानी 10 का दो-तिहाई लगभग 6.66 होता है, जिसे कानूनी रूप से 7 माना जाएगा।
वर्तमान स्थिति में देखा जाए तो राघव चड्ढा के दावे के अनुसार, 7 सांसद (राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता, और विक्रमजीत सिंह साहनी) बीजेपी में शामिल हो रहे हैं।
चूंकि 7 सांसद (जो 10 का 70% है) एक साथ बीजेपी में शामिल हुए हैं, इसलिए यह संख्या '2/3' के संवैधानिक बेंचमार्क को पार कर जाती है। नतीजतन, ये सांसद अपनी राज्यसभा सदस्यता खोने से कानूनी रूप से बच सकते हैं, क्योंकि इसे एक "पार्टी विलय" की तरह देखा जाएगा।
क्या यह वाकई सुरक्षित है?
हालांकि कानून 2/3 बहुमत पर सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन ऐसी स्थितियों में अक्सर कानूनी और प्रक्रियात्मक चुनौतियां सामने आती हैं…
1. सभापति का निर्णय- दलबदल के मामलों में राज्यसभा के सभापति की भूमिका निर्णायक होती है। वे विलय की वैधता और संबंधित दस्तावेजों की जांच करते हैं।
2. पार्टी की ओर से चुनौती- AAP इसे 'ऑपरेशन लोटस' और 'विश्वासघात' बताकर कानूनी चुनौती दे सकती है, यह तर्क देते हुए कि क्या यह प्रक्रिया दल के भीतर वास्तव में हुई या दबाव में।
3. स्पीकर/सभापति के समक्ष प्रक्रिया- यह सांसदों को अब सभापति को विधिवत सूचित करना होगा कि उन्होंने अपनी पार्टी का विलय BJP में कर लिया है।
देखा जाए तो तकनीकी और कानूनी रूप से, 7 सांसदों का एक साथ बाहर आना उन्हें 'अयोग्यता' से बचाने के लिए पर्याप्त है। यदि उनकी संख्या 7 से कम होती, तो वे तुरंत सदस्यता खो देते।
Published By : Shashank Kumar
पब्लिश्ड 24 April 2026 at 18:02 IST