TMC सांसदों ने CM सुवेंदु के साथ की मीटिंग, दिन भर दिल्ली में गहमागहमी... आखिर ममता बनर्जी के नाक के नीचे कैसे हो गया 'खेला'?
TMC Split: दिल्ली में इतना कुछ हो रहा था। ममता बनर्जी खुद यहां मौजूद थी, तब भी वह इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साधे रखीं। उन्होंने विद्रोही सांसदों और पूरे घटनाक्रम पर अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
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TMC: 15 साल तक बंगाल की सत्ता पर अकेले राज करने वाली ममता बनर्जी को महज एक महीने के अंदर अपनी कुर्सी, अपनी सत्ता तो गंवा दी और अब पार्टी गंवाने का खतरा मंडरा रहा है। विधानसभा चुनाव में भारी हार के बाद कोलकाता में बुरी तरह से टूट चुकी है। अब वहीं 'खेला' ममता बनर्जी के साथ दिल्ली में भी होता दिख रहा है। टीएमसी में बगावत की आंच पहले विधायकों तक सीमित थी, लेकिन अब सांसदों तक पहुंच गई है।
भूपेंद्र यादव के घर बागी सांसदों की बैठक
सोमवार, 8 जून को दिल्ली में राजनीति का गजब नजारा देखने मिला। एक तरफ बंगाल में TMC के टूटने के बाद ममता बनर्जी INDI ब्लॉक की बैठक में शामिल होने के लिए राजधानी आईं। यहां एक तरफ वो मीटिंग में तो विपक्षी गठबंधनों के साथ अपनी एकता दिखा रही थी।
दूसरी ओर, दिल्ली में ही BJP नेताओं भूपेंद्र यादव के घर TMC के बागी सांसदों की एक अहम बैठक हो रही थी। इस मीटिंग में पश्चिम बंगाल के सीएम सुवेंदु अधिकारी भी मौजूद थे। बैठक के बाद लोकसभा के 28 TMC सांसदों में से 20 ने NDA सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है।
ममता बनर्जी के 28 में से 20 लोकसभा सांसद टूट रहे
सांसद और TMC की पूर्व नेता काकोली घोष दस्तीदार ने बताया कि 20 सांसदों ने NDA को समर्थन देने की जानकारी लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को दे दी है। TMC के बागी सांसदों ने अलग संसदीय गुट के तौर पर मान्यता देने की मांग की है। बताया जा रहा है कि कोलकाता में विधायकों ने जो किया, वैसे ही कुछ दिल्ली में अब सांसद का भी प्लान है। वह लोकसभा में TMC के संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी की जगह काकोली घोष को नया नेता बनाने चाहते हैं।
क्या ममता की कमजोरी होती पकड़ का संकेत?
दिल्ली में इतना कुछ हो रहा था। ममता बनर्जी खुद यहां मौजूद थी, तब भी वह इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साधे रखीं। उन्होंने विद्रोही सांसदों और पूरे घटनाक्रम पर अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। न कोई बयान, न कोई ट्वीट, न ही अपने करीबी नेताओं के माध्यम से कोई सख्त संदेश। ममता की यह चुप्पी असामान्य है। जो नेता छोटी-से-छोटी घटना पर तीखा हमला बोलने के लिए जानी जाती हैं, आज अपने ही सांसदों के बड़े विद्रोह पर मौन साधे हुए हैं। इसे उनकी कमजोर होती पकड़ का संकेत माना जा रहा है।
Published By : Ruchi Mehra
पब्लिश्ड 8 June 2026 at 23:44 IST