'बिना जाने जज न बनें लोग...' प्रेमानंद महाराज के आश्रम पर उठ रहे सवालों के बीच बोले अनिरुद्धाचार्य
अनिरुद्धाचार्य महाराज ने संत प्रेमानंद महाराज का समर्थन करते हुए कहा कि वे एक सच्चे और लोकोपकारी संत हैं, जो निरंतर समाज के उद्धार और जन-कल्याण में समर्पित रहते हैं। उनके एक शिष्य की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु पर संत प्रेमानंद महाराज को दोषी ठहराना पूरी तरह से अनुचित है। मृत्यु जीवन का एक अटल सत्य और नियति का नियम है, जिसे कोई टाल नहीं सकता।
- भारत
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वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज के शिष्य दीपक लोधी की दुखद मौत के बाद खड़ा हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। आश्रम और संत प्रेमानंद पर उठते सवालों के बीच अब प्रसिद्ध कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज खुलकर उनके बचाव में आ गए हैं। उन्होंने आलोचकों को करारा जवाब देते हुए संत प्रेमानंद के प्रति अपनी संवेदना और समर्थन व्यक्त किया है।
दीपक लोधी की मौत और आश्रम के बाहर हंगामा
यह पूरा मामला 25 सितंबर का है, जब प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी शरण ने वृंदावन स्थित 'गुरु कृपा कुंज' की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना के बाद से ही आश्रम की व्यवस्थाओं और प्रेमानंद महाराज पर सवाल खड़े किए जाने लगे। स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब अलग-अलग क्षेत्रों से आए तीन परिवारों ने अपने परिजनों की गुमशुदगी का आरोप लगाते हुए आश्रम के बाहर जोरदार हंगामा किया।
'बिना जाने जज बन जाते हैं लोग' - अनिरुद्धाचार्य
विवाद बढ़ता देख अनिरुद्धाचार्य महाराज ने प्रेमानंद महाराज का पक्ष लेते हुए कहा कि आज लोग सच्चाई जाने बिना ही फैसला सुनाने लगते हैं। उन्होंने कहा, "इतने बड़े संत पर न जाने क्या-क्या आरोप लगाए जा रहे हैं। कुछ लोग बिना सोचे-समझे खुद जज बनकर न्याय करने बैठ जाते हैं। प्रेमानंद महाराज ने अपने कथावाचन से करोड़ों लोगों के जीवन को भक्ति से जोड़ा और उनके मन में भगवान की प्रीत जगाई। इतना सब कुछ सुनने के बाद भी वे खामोश हैं, यही उनकी महानता है।"
स्वास्थ्य की परवाह किए बिना जन-कल्याण में लीन
प्रेमानंद महाराज की शारीरिक स्थिति का उल्लेख करते हुए अनिरुद्धाचार्य ने कहा कि उनकी किडनियां काम नहीं कर रही हैं और शरीर में हर समय सूजन बनी रहती है। इतनी तकलीफ के बावजूद वे लोगों के दुख दूर करने और उन्हें सही राह दिखाने के लिए रोजाना उनसे मिलते हैं।आलोचकों पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा, 'जब मेंढक टर-टर करते हैं तो कोयल चुप हो जाती है। समय मेंढकों का है, इसलिए कोयल शांत है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि गुलाब हमेशा कांटों के बीच ही खिलता है।" इसके साथ ही उन्होंने श्लोक दोहराया 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि', यानी जब व्यक्ति के विनाश का समय आता है तो उसकी बुद्धि उल्टी दिशा में काम करने लगती है।
मौत शाश्वत सत्य, संतों को कटघरे में खड़ा करना अनुचित
अनिरुद्धाचार्य महाराज ने स्पष्ट किया कि धरती मृत्यु लोक है और यहां जिसने जन्म लिया है, उसे एक न एक दिन जाना ही होगा। किसी शिष्य की मृत्यु के लिए प्रेमानंद महाराज को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह से बेबुनियाद है। साधु-संत ईश्वर का भजन करते हैं, लेकिन वे अजर-अमर नहीं हैं। उन्होंने अपील की कि पूरी बात और सच्चाई जाने बिना किसी भी संत को इस तरह मानसिक रूप से परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
Published By : Aarya Pandey
पब्लिश्ड 5 October 2026 at 23:16 IST