Bihar Election: आजादी के बाद से बिहार में अब तक BJP क्यों रही CM की कुर्सी से दूर, कब तक निभाएगी छोटे भाई की भूमिका?
नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच पुराना गठबंधन अटल बिहारी वाजपेयी के समय से एक "समझौते" पर आधारित था, जिसमें बीजेपी ने बिहार में जेडीयू को बड़े भाई का दर्जा दिया था।
देश की आजादी के बाद से अब तक बीजेपी ने न सिर्फ केंद्र में बल्कि देश के कई राज्यों में सरकार बनाई है। उसने देश को प्रधामंत्री दिए हैं और कई राज्य के मुख्यमंत्री भी। हालांकि बिहार एक ऐसा राज्य है जहां पार्टी अपने अकेले दम पर न तो बहुमत हासिल कर सकी है न उसका खुद का मुख्यमंत्री ही बन सका है। आइए आपको समझाते हैं कि क्यों बीजेपी बिहार में अब तक सीएम की कुर्सी नहीं पा सकी है और क्यों वह सिर्फ इस राज्य में छोटे भाई के रोल तक सीमित है।
जनसंघ का दौर (1951-1977): आज़ादी के बाद, 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। बिहार में शुरुआती विधानसभा चुनावों (1952 और 1957) में जनसंघ को कोई खास सफलता नहीं मिली और उसका प्रभाव सीमित रहा। 1962 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनसंघ ने पहली बार 3 सीटें जीतकर विधानसभा में अपना खाता खोला। यह पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था। 1967 के चुनाव में जनसंघ ने अपनी सीटों की संख्या और बढ़ाई, जिससे बिहार की राजनीति में उसकी उपस्थिति और मजबूत हुई। आपातकाल के बाद, 1977 में जनसंघ का कई अन्य दलों के साथ जनता पार्टी में विलय हुआ। 1977 के विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी ने बड़ी जीत हासिल की, लेकिन यह बीजेपी के रूप में उसका प्रदर्शन नहीं था।
आगे चलकर समाजवादी नेताओं ने मांग की कि जनसंघ गुट के नेता या तो जनता पार्टी की सदस्यता रखें या RSS की सदस्यता। वे नहीं चाहते थे कि जनसंघ के नेता एक साथ जनता पार्टी और RSS के सदस्य रहें। जनसंघ के नेताओं ने RSS से नाता तोड़ने से इनकार कर दिया। इस वैचारिक टकराव के कारण जनसंघ गुट ने 1979 में जनता पार्टी छोड़ दी और 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई।
BJP का बिहार चुनाव में प्रदर्शन (1980 से 2005) और नीतीश से दोस्ती
जनता पार्टी के टूटने के बाद, 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ। 1980 के पहले चुनाव में बीजेपी ने 21 सीटें जीतीं और बिहार में चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 1985 में पार्टी को कुछ नुकसान हुआ और उसने केवल 16 सीटें जीतीं। राम लहर के प्रभाव से 1990 के चुनाव में बीजेपी ने 39 सीटें जीतीं, जो उसकी बढ़ती ताकत का संकेत था। 1995 के चुनाव में, मंडल की राजनीति के उदय के बावजूद, बीजेपी ने अपनी सीटों की संख्या को लगभग बरकरार रखा। 2000 के चुनाव में, बीजेपी ने 67 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। उस समय राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सबसे बड़ी पार्टी थी और उसकी राज्य में सरकार थी।
आगे चलकर जनता दल (यूनाइटेड) (तत्कालीन समता पार्टी) और बीजेपी ने मिलकर बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के “जंगल राज” को समाप्त करने का लक्ष्य रखा। यह साझेदारी मुख्य रूप से साझा राजनीतिक लक्ष्य (आरजेडी को सत्ता से हटाना) और व्यक्तिगत तालमेल (खासकर अटल बिहारी वाजपेयी और नीतीश कुमार के बीच) पर टिकी थी ।
नीतीश ने सत्ता में बनाया हिस्सेदार, बिहार में छोटे भाई के रूप में बीजेपी
अक्टूबर 2005 में हुए चुनाव में, जनता दल (यूनाइटेड) (JD(U)) और बीजेपी ने मिलकर NDA गठबंधन बनाया। इस गठबंधन को निर्णायक जीत मिली। बीजेपी ने 55 सीटें जीतीं और पहली बार नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार में प्रमुख भागीदार बनी, जिसमें बीजेपी के सुशील कुमार मोदी उपमुख्यमंत्री बने। 2010 के विधानसभा चुनाव में NDA गठबंधन को प्रचंड बहुमत मिला। बीजेपी ने चुनाव लड़ी गई 102 सीटों में से रिकॉर्ड 91 सीटें जीतकर बिहार में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। इस पूरे दौर में, नीतीश कुमार ने बीजेपी को सम्मान दिया और गठबंधन के मुख्यमंत्री बने रहे, जबकि बीजेपी ने उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि का सम्मान करते हुए कभी भी वैचारिक एजेंडा थोपने की कोशिश नहीं की।
2013 नीतीश संग रिश्तों में आई खटास
नीतीश कुमार ने जून 2013 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को छोड़ दिया था। इस बड़े राजनीतिक कदम का मुख्य और एकमात्र कारण नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उभरना था। नीतीश कुमार ने हमेशा खुद को एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में पेश किया। उनका मानना था कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकार करने से उनकी 'धर्मनिरपेक्ष' और 'सुशासन बाबू' की छवि को नुकसान पहुंचेगा, खासकर बिहार के मुस्लिम मतदाताओं के बीच।
बीजेपी ने जब नरेन्द्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव के लिए अपनी चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख नियुक्त किया (और बाद में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया), तो नीतीश कुमार ने इसे एक 'असहनीय' स्थिति माना। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे ऐसे किसी भी व्यक्ति के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करेंगे जिसका अतीत धर्मनिरपेक्षता के उनके मानकों पर खरा न उतरता हो।
नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच पुराना गठबंधन अटल बिहारी वाजपेयी के समय से एक "समझौते" पर आधारित था, जिसमें बीजेपी ने बिहार में जेडीयू को बड़े भाई का दर्जा दिया था। नीतीश कुमार ने आरोप लगाया था कि उनकी सरकार के काम में एक "बाहरी आदमी के इशारे पर" परेशानियां पैदा की जा रही थीं (संकेत स्पष्ट रूप से मोदी की ओर था)। उनके अनुसार, बीजेपी गठबंधन धर्म का उल्लंघन कर रही थी और एक तरफ़ा फ़ैसले ले रही थी। नीतीश कुमार ने बीजेपी कोटे के मंत्रियों को हटाकर सरकार से बर्खास्त कर दिया और बिहार विधानसभा में बहुमत साबित करके अपनी सरकार बचाई थी। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने बिहार में 22 सीटें जीतीं। इस नतीजे ने नीतीश कुमार को एहसास करा दिया कि बीजेपी की बिहार में नीतीश बिन भी स्वीकार्यता हो सकती है।
नीतीश बिन 2015 का चुनाव, विपक्ष में बीजेपी
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में JD(U) ने RJD और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा। बीजेपी अकेले (या छोटे सहयोगियों के साथ) लड़ी और 53 सीटें जीती और विपक्ष में बैठी।
2017- नीतीश फिर बीजेपी को सत्ता में लाए
2017 में नीतीश कुमार के NDA में वापस आने के बाद, बीजेपी फिर से सत्ता में भागीदार बनी। 2020 के विधानसभा चुनाव में, NDA की जीत हुई, लेकिन JD(U) की सीटें कम हो गईं। बीजेपी ने 74 सीटें जीतकर JD(U) (43 सीटें) से अधिक सीटें हासिल कीं और गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के जनता दल (यूनाइटेड) (जेडीयू) से अधिक सीटें जीतने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया।
सीटें अधिक फिर भी बीजेपी का CM क्यों नहीं?
1. गठबंधन की स्थिरता और एकता : बिहार जैसे राज्य में, जहां क्षेत्रीय दलों का मजबूत आधार है, गठबंधन की राजनीति महत्वपूर्ण है। नीतीश कुमार को सीएम बनाए रखना बीजेपी के लिए गठबंधन की एकता और स्थिरता बनाए रखने के लिए ज़रूरी है, क्योंकि जेडीयू का समर्थन खोना सीधे तौर पर एनडीए सरकार के गिरने का कारण बन सकता है।
2. नीतीश कुमार की स्वीकार्यता: नीतीश कुमार की छवि सुशासन बाबू के रूप में रही है और उनकी स्वीकार्यता आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंक के बाहर भी है। बीजेपी को पता है कि राज्य में शासन चलाने और सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए नीतीश कुमार का चेहरा अब भी प्रभावी है।
3. सियासी फायदे का नपा तुला कैलकुलेशन : अगर बीजेपी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद देने से मना कर देती है, तो जेडीयू के पास महागठबंधन के साथ मिलकर सरकार बनाने का विकल्प है। बीजेपी इस स्थिति से बचना चाहती है, क्योंकि इससे न सिर्फ वह सत्ता से बाहर हो जाती, बल्कि बिहार में एक मजबूत विपक्षी सरकार बन जाती। जेडीयू केंद्र में भी बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है। बिहार में जेडीयू को नाराज करना राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन को कमजोर कर सकता है।
4. बीजेपी के पास नेतृत्व का अभाव: बीजेपी के पास बिहार में नीतीश कुमार जितनी मजबूत, सर्व-स्वीकार्य और अनुभवी राजनीतिक हस्ती नहीं है, जिसे मुख्यमंत्री बनाया जा सके। किसी नए नेता को आगे करने से सरकार की स्थिरता और अनुभव पर सवाल उठ सकते हैं।
2022 में नीतीश ने फिर बदला पाला, बीजेपी एक बार फिर विपक्ष में
2022 में सीएम नीतीश कुमार ने 2013 की तरह ही एनडीए को छोड़ दिया और आरजेडी और कांग्रेस की मदद से मुख्यमंत्री बने रहे। इस घटना से बीजेपी ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया और वह फिर से विपक्ष में आ गई।
2024 में एक बार फिर नीतीश BJP के साथ आए
2024 में लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश एक बार फिर बीजेपी के साथ आ गए। 2025 का बिहार चुनाव भी वे बीजेपी के साथ मिलकर ही लड़ रहे हैं। बीजेपी और जेडीयू के बीच इस बार के विधानसभा चुनाव के लिए बराबर सीटों का बंटवारा हुआ है। देखना होगा कि चुनाव नतीजे क्या रहते हैं?
Published By : Subodh Gargya
पब्लिश्ड 29 October 2025 at 23:34 IST