अपडेटेड 26 January 2026 at 17:03 IST
खुरों की थाप और पंखों की फड़फड़ाहट, कर्तव्य पथ पर पहली बार दिखे भारतीय सेना के 'साइलेंस वॉरियर्स'
गणतंत्र दिवस 2026 की परेड में भारतीय सेना के हिम योद्धा दस्ते ने इतिहास रचा। बैक्ट्रियन ऊंट, ज़ांस्कर घोड़े, ब्लैक काइट्स (रैप्टर्स), ग्लेशियर एटीवी और बहादुर कुत्तों के साथ यह दस्ता कर्तव्य पथ पर डटा। कैप्टन हर्षिता राघव के नेतृत्व में इन मूक योद्धाओं ने हिमालय की चुनौतियों में सैनिकों के साथ निभाई भूमिका को गौरवान्वित किया और 'वसुधैव कुटुम्बकम' का संदेश दिया।
77th Republic Day Parade : भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस पूरे उत्साह और गर्व के साथ मना रहा है। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस की भव्य परेड में भारतीय सेना के 'साइलेंस वॉरियर्स' हिम योद्धा देखने को मिले। इन योद्धाओं ने पहली बार दिल्ली के कर्तव्य पथ पर कदम रखा। ये योद्धा कोई और नहीं, बल्कि सेना के उन वफादार पशु साथी हैं, जिन्होंने सालों से चुपचाप देश की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
इस दस्ते ने जैसे की कर्तव्य पथ पर कदम रखा, तो देशवासियों के मन में गर्व और सम्मान की लहर दौड़ा दी। इस विशेष दस्ते ने न केवल सैनिकों की वीरता को दर्शाया, बल्कि हिमालय की कठिन परिस्थितियों में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर सेवा देने वाले मूक योद्धाओं, पशुओं, पक्षियों और विशेष वाहनों की अद्भुत भूमिका को भी पूरी दुनिया के सामने गौरवान्वित किया।
कैप्टन हर्षिता राघव ने किया नेतृत्व
इस दस्ते का नेतृत्व कैप्टन हर्षिता राघव ने किया, जिनके मार्गदर्शन में बैक्ट्रियन ऊंट, ज़ांस्कर घोड़े, ब्लैक काइट्स (रैप्टर्स), ग्लेशियर एटीवी और देशी नस्ल के कुत्ते एक साथ कर्तव्य पथ पर डटकर चले। इन सभी ने मिलकर 'वसुधैव कुटुम्बकम' के सिद्धांत को साकार किया, जहां हर प्राणी राष्ट्रसेवा में भागीदार बनता है।
कर्तव्य पथ पर पहली बार 'साइलेंस वॉरियर्स'
भारतीय सेना के रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर (RVC) की ओर से विशेष रूप से तैयार की गई इस पशु टुकड़ी ने इस बार गणतंत्र दिवस परेड में हिस्सा लिया। यह पहला अवसर है जब ऐसे पशु योद्धाओं को कर्तव्य पथ पर मार्च करते देखा गया। इस टुकड़ी में बैक्ट्रियन ऊंट, ज़ांस्कर घोड़े, रैप्टर्स (शिकारी पक्षी), भारतीय नस्ल के आर्मी डॉग्स और अन्य सैन्य कुत्ते शामिल थे। ये सभी दुर्गम और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में सेना की मदद करते आए हैं, जहां आधुनिक तकनीक कई बार नाकाम साबित हो जाती है।
दोहरे कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंट: लद्दाख के ठंडे इलाकों गलवान और नुब्रा घाटी से लाए गए, 15,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर भारी सामान ढोने की अपनी अद्भुत क्षमता के लिए प्रसिद्ध हैं। 200 किलोग्राम तक वजन उठाने वाले ये मजबूत साथी रेतले और खड़ी ढलानों पर भी बिना अधिक देखभाल के सेवा देते हैं। ये LAC पर लॉजिस्टिक्स के प्रतीक बन चुके हैं, जो सैनिकों के लिए जीवनरेखा साबित होते हैं।
ज़ांस्कर घोड़े: लद्दाख की ऊंची घाटियों के यह दुर्लभ और संकटग्रस्त नस्ल के योद्धा, पहली बार कर्तव्य पथ पर परेड करते हुए दिखे। सियाचिन ग्लेशियर और LAC पर सामान ढोने, गश्त करने और सीमा की रक्षा में सैनिकों के साथ कष्ट सहने वाले इन घोड़ों के खुरों की थाप ने साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम की गूंज पैदा की।
ग्लेशियर एटीवी: ये मजबूत स्नोमोबाइल सियाचिन जैसे विश्व के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में आपूर्ति पहुंचाने और घायलों को निकालने का काम करते हैं। 200 किलोग्राम क्षमता वाले इन वाहनों के साथ जुड़े स्लेज ने कठोर मौसम में भी निर्बाध सेवा सुनिश्चित की।
भारतीय नस्ल के बहादुर कुत्ते: मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बाई और राजपालयम नस्ल के कुत्तों ने भी परेड में भाग लिया। बुलेट-प्रूफ जैकेट, कैमरा, जीपीएस और उन्नत सर्विलांस उपकरणों से लैस ये कुत्ते आक्रमण, गश्त और निगरानी में सेना के लिए बलवर्धक सिद्ध होते हैं।
ब्लैक काइट्स: इस परेड में सबसे अनोखा था ब्लैक काइट्स (रैप्टर्स) का समावेश। ये चतुर और सतर्क पक्षी LoC के पार निगरानी और एंटी-ड्रोन सहायता प्रदान करते हैं। उनकी उपस्थिति ने दस्ते को और भी प्रभावशाली बनाया, मानो पंख फड़फड़ाते हुए राष्ट्र की रक्षा में योगदान दे रहे हों।
यह परेड सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में तैनात हमारे योद्धाओं के साथ इन मूक साथियों की एकजुटता, सहनशक्ति और निस्वार्थ सेवा की जीवंत मिसाल थी। इनके खुरों की थाप और पंखों की फड़फड़ाहट ने पूरे देश को याद दिलाया कि राष्ट्रसेवा में हर प्राणी का योगदान अमूल्य है।
इन 'साइलेंस वॉरियर्स' का योगदान वाकई सराहनीय है। सियाचिन ग्लेशियर जैसे अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, माउंटेड पैट्रोल, विस्फोटक डिटेक्शन, ट्रैकिंग, काउंटर-टेररिज्म ऑपरेशन्स, आपदा राहत और सर्च-एंड-रेस्क्यू मिशनों में इनकी भूमिका अतुलनीय रही है। ये पशु न केवल शारीरिक रूप से मजबूत होते हैं, बल्कि अपनी वफादारी और सहनशक्ति से सैनिकों के प्राणों की रक्षा करते हैं।
इस ऐतिहासिक परेड में इन योद्धाओं की मौजूदगी ने पूरे देश को भावुक कर दिया। यह न केवल सेना की बहादुरी का प्रतीक है, बल्कि उन अनदेखे नायकों को सम्मान देने का भी एक सुंदर प्रयास था, जो कभी पदक नहीं मांगते, न ही शोर मचाते हैं, फिर भी देश की सुरक्षा में अग्रणी रहते हैं।
Published By : Sagar Singh
पब्लिश्ड 26 January 2026 at 17:03 IST